अष्टावक्र व उनके पिता कोहल ऋषि की तपोभूमि अनूठी, पयर्टन-आध्यात्म एक साथ

बिहार के कहलगांव आइलैंड अपने आप में अलौकिक और खूबसूरत है। अब सरकार ने इसे रॉक कट टेंपल के रूप सुरक्षित घोषित करने का निर्देश जारी किया है।

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भागलपुर: बिहार के भागलपुर का कहलगांव कई मायनों में खास है। एक ऐसा धार्मिक पर्यटन व पौराणिक स्थल है, जहां लोग शांति की तलाश में नौका विहार कर पहुंचते हैं। यह आइलैंड की तरह है, जो अपने आप में काफी अलौकिक और खूबसूरत है। गंगा के बीचों बीच 3 पहाड़ियां हैं, जो कई मायनों में खास और ऐतिहासिक भी हैं। पहाड़ के ऊपर मंदिर और गुफा है। इस गुफा के बारे में कहा जाता है कि अष्टावक्र मुनि के पिता कोहल ऋषि ने यहां पर तपस्या की थी।
नौका विहार के माध्यम से इस धार्मिक आइलैंड की खूबसूरती को निहारने के लिए कई राज्यों से सैलानी पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय से करीब 39 किलोमीटर दूर कहलगांव में गंगा के बीच यह पर्यटन स्थल हैं। गंगा का जलस्तर जब बढ़ता है तो तीनों पहाड़ी के चारों तरफ पानी भर जाता है, जिससे आइलैंड जैसा नजारा दिखता है। मई -जून में जब पानी कम हो जाता है तो तीनों पहाड़ी के चारों ओर रेत ही रेत दिखाई देती है। मानों यह थाईलैंड है, उस समय भी काफी लोग यहां इसकी खूबसूरती देखने आते हैं।
इस धार्मिक आइलैंड की खूबसूरती को देखने के लिए कई राज्यों से सैलानी नौका विहार कर के पहुंचते हैं। अब सरकार ने भी इसे रॉक कट टेंपल के रूप में सुरक्षित घोषित करने का निर्देश जारी किया है। पहाड़ियों का यह क्षेत्र विक्रमशिला गंगेटिक डॉल्फिन का क्षेत्र भी है। यहां डॉल्फिन की अठखेलियों को देखने के लिए भी लोग नाव से पहुंचते हैं।
कहलगांव के राजघाट स्थित गंगा तट से यह तीनों आकर्षक पहाड़ियां नजर आती हैं, जो बिहार समेत पूरे देश के लिए एक अद्भुत आकर्षण का केंद्र हैं। कहलगांव राजघाट से जब आप नाव पर सवार होकर गंगा नदी में आगे बढ़ेंगे, तो सबसे पहला स्थान आपको शांति बाबा पहाड़ मिलेगा। इसके चारों ओर गंगा नदी की अविरल धारा बहती है। इससे आगे बढ़ने पर दूसरा बंगाली बाबा पहाड़ है। उसके ठीक पास में पंजाबी बाबा पहाड़ है। नदी के बीचों-बीच यह तीनों पहाड़ इतने अलौकिक हैं, जो सैलानियों को अपनी ओर खींच लाते हैं।
पहाड़ियों का नाम कालांतर में बुद्धा आश्रम, तापस आश्रम और नानकशाही आश्रम के रूप में था। बिहार सरकार की कला संस्कृति एवं युवा विभाग की पहल पर इन पहाडिय़ों की अब जांच की जाएगी। साथ ही ये बिहार प्राचीन पुरातत्व अवशेष व कलानिधि अधिनियम 1976 के तहत अधिसूचित घोषित की जाएगी। इस धार्मिक पर्यटन स्थल को सरकार अब रॉक कट टेंपल के रूप में सुरक्षित घोषित करने जा रही है।  इसके तहत इस दर्शनीय क्षेत्र को और भी विकसित करने का प्लान है।


रोपवे से जोड़ने का प्रस्ताव
नगर पंचायत कहलगांव में इस स्थान को रोपवे से जोडऩे का प्रस्ताव पास हुआ था। हालांकि इससे यहां के नाविक खुश नहीं है। स्थानीय नाविक सौरव सिंह ने कहना है की धार्मिक स्थल की खूबसूरती नौका विहार के माध्यम से पहुंचने पर ही है। ऐसे में रोपवे बन जाने से इसकी खूबसूरती भी घटेगी और हमारा रोजगार भी बंद हो जाएगा। सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ में रोपवे बनने से काम हो गया ठीक उसी तरह यहां भी वह आनंद नहीं मिलेगा जो नौका विहार कर इस स्थल पर पहुंचने में मिलता है। डॉल्फिन क्षेत्र है और हम नविको को पता है कि किस जगह पर डॉल्फिन देखा जा सकता है, हम पर्यटक को वहां पर ले जाते हैं तो यह चीज रोपवे में बनने के बाद खत्म हो जाएगी।
देश-विदेश से साधु-संत साधना के लिए आते हैं
बंगाली बाबा पहाड़ी पर साधना के लिए पहुंचे झारखंड के पाकुड़ के संत प्रमुख दास ने बताया कि यहां लोग शांति प्राप्ति के लिए पहुंचते हैं। देश-विदेश से लोग साधना के लिए आते हैं। इस पहाड़ी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन जो जानकारी है उसके अनुसार यहां तीन पहाड़ी है एक शांति बाबा फिर बंगाली बाबा पहाड़ी, बीच वाला पहाड़ी बंगाली यहां पर पहाड़ी के सबसे ऊपर एक गुफा है। उस गुफा में कोहल ऋषि और अष्टावक्र मुनि दोनों ने तपस्या की थी। कोहल ऋषि के कारण ही इस शहर का नाम कहलगांव पड़ा है।
संत प्रमुख दास के मुताबिक, बगल में पंजाबी बाबा पहाड़ी है, जहां सिख धर्म से जुड़े लोग आते हैं। इस पहाड़ी में हजारों संत मुनियों ने तपस्या और साधना की है। यहां पुण्य के लिए लोग आते हैं। अभी वर्तमान में बंगाली बाबा पहाड़ी के मुख्य राधे बाबा है और पंजाबी बाबा पहाड़ी के संजय बाबा है। उन्होंने कहा कि कोहल ऋषि काफी ज्ञानी थे, जिस वजह से उनके पुत्र पर कोहल ऋषि का असर पड़ गया था। कोहल ऋषि से भी ज्यादा ज्ञानी उनका पुत्र हो गया था, गर्भ में ही रहते हुए अपने पिता कोहल ऋषि के गलतियों को पकड़ लेता था, जिससे क्रोधित होकर कोहल ऋषि ने गर्भ में पल रहे पुत्र को आठों अंग टेढ़ा होने का श्राफ दे दिया था कि जन्म लेते ही अपंग हो जाओगे। इस वजह से अष्टावक्र का सभी अंग टेढ़ा था, अष्टावक्र ने भी श्राफ से मुक्ति के लिए यहां पर ही साधना की थी।
रेल, सड़क और जलमार्ग से पहुंच सकते हैं
अगर आप भी कहलगांव की इन तीन पहाडिय़ों की खूबसूरती को देखने के लिए यहां आना चाहते हैं, तो आप भागलपुर से सड़क, रेल और जल मार्ग से यहां पहुंच सकते हैं। कहलगांव के राजघाट और बटेश्वर स्थान घाट से लोग नाव के माध्यम से यहां पहुंचते हैं। वहीं, अगर आप पश्चिम बंगाल की ओर से आते हैं, तो आप गंगा नदी से साहिबगंज के रास्ते कहलगांव पहुंच सकते हैं। दूसरे किनारे पर नवगछिया तीनटंगा है। यहां से नाव के जरिए भी आप पहुंच सकते हैं। विदेशों से सैलानी बंगाल की ओर से गंगा नदी में क्रूज या जहाज के माध्यम से या ट्रेनों के माध्यम से यहां पहुंचते हैं। नौका विहार के माध्यम से तीनों पहाडिय़ों तक सैलानी पहुंचते हैं। यहां सैलानियों की भीड़ लगी रहती है, जो इस क्षेत्र की खूबसूरती को चार चांद लगाता है।

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