आरा/बड़हरा: बिहार में चुनावी सरगर्मियां तेज हैं। बड़हरा विधानसभा क्षेत्र में चुनावी माहौल के बीच राजद को बड़ी राजनीतिक संजीवनी मिली है। पार्टी के बागी नेता रघुपति यादव ने नामांकन रद्द होने के बाद एक बार फिर पार्टी में वापसी करते हुए राजद प्रत्याशी अशोक कुमार सिंह उर्फ रामबाबू सिंह को अपना पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की है। इससे न केवल पार्टी में नई ऊर्जा का संचार हुआ है, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में समीकरण भी तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।
मेरे लिए पार्टी सर्वोपरि- रघुपति यादव
रविवार सुबह रघुपति यादव ने रामबाबू सिंह के आवास पर जाकर औपचारिक रूप से समर्थन का ऐलान किया। उन्होंने कहा है कि हमारे नेता लालू प्रसाद यादव की सीख हमेशा रही है कि पार्टी सर्वोपरि है। कुछ असहमति जरूर हुई थी, लेकिन अब समय है एकजुट होकर राजद की जीत सुनिश्चित करने का। रामबाबू सिंह मेरे बड़े भाई समान हैं, और अब हम साथ मिलकर बड़हरा में लालटेन को रौशन करेंगे।
रघुपति यादव के फैसले का समर्थन- रामबाबू
इस मौके पर रामबाबू सिंह ने रघुपति यादव के फैसले का स्वागत करते हुए कहा, “यह कदम पार्टी की एकता और संगठनात्मक मजबूती को दर्शाता है। रघुपति जी का साथ मिलना हमारे लिए ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है। जनता का जोश बता रहा है कि इस बार बदलाव तय है।”
जनसंपर्क अभियान में उमड़ा जनसैलाब
समर्थन के ऐलान के बाद दोनों नेताओं ने चंदा पंचायत के विभिन्न गांवों – छोटकी चंदा, बड़की चंदा, पचैना, बलहा, सेमरा और विशुनपुर – में संयुक्त रूप से जनसंपर्क अभियान चलाया। ग्रामीणों ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया और भारी संख्या में लोगों ने राजद प्रत्याशी के समर्थन का भरोसा जताया। युवाओं की टोलियां भी सक्रिय होकर गांव-गांव घूम रही हैं और ‘तेजस्वी बनाओ, बिहार बचाओ’ जैसे नारों के साथ मतदाताओं से संपर्क कर रही हैं।
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क्या कहता है राजनीतिक विश्लेषण?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि रघुपति यादव का समर्थन मिलने से राजद को बड़हरा में सीधा फायदा मिलेगा। पहले उनके बागी तेवर से पार्टी को नुकसान की आशंका थी, लेकिन अब उनकी घर वापसी ने न केवल मतों का बिखराव रोका है, बल्कि संगठन को भी मजबूत किया है।
बहरहाल बड़हरा की राजनीति में यह घटनाक्रम राजद के लिए संजीवनी से कम नहीं है। पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह की लहर है, और यदि यह लय बनी रही तो रामबाबू सिंह के लिए यह मुकाबला निर्णायक रूप ले सकता है। अब देखना यह है कि यह एकता मतदाताओं को कितनी प्रभावित करती है और 2025 के चुनाव परिणामों में इसका क्या असर देखने को मिलता है।



