भागलपुर: बिहार आलू उत्पादन में पश्चिम बंगाल को पछाड़ने की तैयारी कर चुका है। आधुनिक तकनीकों और सरकारी सहयोग के बल पर राज्य में आलू की खेती को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की योजना बन रही है। सभी जिलों में आलू के रकबे को बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। हाइड्रोपोनिक्स और एयरोपोनिक्स जैसी नवीन तकनीकों को साथ बिहार आलू उत्पदन में देश में नंबर दो बनने की राह पर है।
एयोपोनिक्स खेती
एयरोपोनिक्स तकनीक में पौधों की मिट्टी की जरूरत नहीं होती। उनकी जड़ें हवा में लटकी रहती हैं और पोषक तत्वों से भरपूर घोल को जड़ों पर छिड़का जाता है। इससे पौधों का विकास तेजी से होता है और उपज में वृद्धि होती है। एरोपोनिक्स में पानी की खपत हाइड्रोपोनिक्स की तुलना में कम होती है। पौधे की जड़ें हवा के संपर्क में होती है इसलिए इन्हें अधिक ऑक्सीजन मिलती है, जिससे पौधों का विकास बेहतर हो सकता है। नियंत्रत वातावरण के कारण एरोपोनिक्स में रोगों का खतरा कम होता है।
हाइड्रोपोनिक्स खेती
हाइड्रोपोनिक्स, जिसे मृदा रहित खेती भी कहा जाता है, में पौधों को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम से युक्त पानी के घोल में उगाया जाता है। यह तकनीक पैधों को सीधे पोषक तत्व प्रदान करती है, जिससे उनकी वृद्धि तेज होती है।
बिहार में आलू की खेती आमतौर पर अक्टूबर के अंत और नवंबर के बीच की जाती है और जनवरी से मार्च के दौरान कटाई होती है। कुफरी सिंदूरी, कुफरी चंद्रमुखी, राजेंद्र आलू 01, राजेंद्र आलू 03 और कुफरी चिप्सोना जैसी किस्में यहां लोकप्रिय हैं। इन नई तकनीकों और सरकारी प्रयासों के दाम पर बिहार न केवल आलू उत्पदन में बंगाल पछाड़ने की दिशा में बढ़ रहा है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और क्षेत्र में नई क्रांति लाने की दिशा में भी कदम उठा रहा है।
एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीटूट की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश आलू उत्पादन में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ शीर्ष पर है जबिक पश्चिम बंगाल 23 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर काबिज है। बिहार 17 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तीसरे पायदान पर है। वर्ष 2025 में बिहार में 3.30 लाख हेक्टेयर भूमि पर आलू की खेती की गई, जिसमें प्रति हेक्टेयर 27654 किलोग्राम की उपज हासिल हुई। बंगाल से केवल छह प्रतिशत पीछे रहने के कारणों कर जांच में पता चला वर्तमान में बिहार के केवल नौ जिले पटना, नालंदा, भागलपुर आदि आलू की खेती के लिए प्रमुख हैं। इसे देखते हुए सभी जिलों में उत्पादन बढ़ाने का फैसला लिया गया है। कृषि विभाग के सर्वेक्षण में सामने आया कि कई क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता और प्रतिकूल मौसम के कारण उत्पादन कम हो रहा है, जिससे किसानें को नुकसान उठाना पड़ता है। साथ ही आलू के भंडारण की समुचित व्यवस्था न होने और मौजूदा बीजों से उत्पादित आलू के मौसमी नमी या रूखेपन मे जल्दी सड़ने की समस्या सामने आई है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए बिहार में हाइड्रोपोनिक्स और एयरोपोनिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने की तैयारी है। नालंदा के नूरसराय उद्यान महाविद्यालय में इन तकनीकों पर शोध चल रहा है, जिसमें आलू के सड़ने के कारणों और उनके बचाव के उपायों पर काम हो रहा है।
इसको भी पढ़े: बिहार में 50,000 किसानों को मिलेगा प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण
युवा जलोढ़ चूर्णयुक्त मिट्टी :
ये मुजफ्फरपुर, समस्तीपर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण के दक्षिणी भाग, वैशाली, सीवान, गोपालगंज और सारण जिलों में गंडक नदी से जुड़े उत्तर बिहार के बड़े क्षेत्रों में पाई जाती है।
युवा जलोढ़ अचूर्णयुक्त मृदा:
मधुबनी, दरभंगा और सीतामढ़ी जिलों में पाई जाती है और बागमती नदी से जुड़ी है।
हालिया जलोढ़, गैर चूनायुक्त लवणीय मृदा:
ये मृदा कोसी और महानंदा नदियें के जलोढ़ मैदी इलाके सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया और कटिहार में है।
पुरानी जलोढ़ मिट्टी: पटना, नालंदा, गया, नवादा, जहानाबाद, रोहतास और भोजपुर की मिट्टी पुरानी जलोढ़ है जबकि मुंगेर, शेखपुरा और भागलपुर की मिट्टी हल्की बनावट की होती है, जो गादयुक्त दोमट से लेकर चिकनी दोमट तक होती है।




