US का दोहरा रवैया: भारत पर रूसी तेल के लिए भारी टैरिफ, चीन को छूट

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का कहना है कि चीन पर पाबंदी लगाने से वैश्विक तेल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं। जबकि यूएस ने भारत पर 50% टैरिफ लगा रखा है।

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नई दिल्ली: अमेरिका ने एक बार फिर अपनी नीतियों में दोहरापन दिखाया है। रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर कड़े टैरिफ लगाए गए हैं, जबकि रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार चीन बिना किसी सजा के बच निकला है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि चीन पर पाबंदी लगाने से वैश्विक तेल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं। दूसरी ओर भारत को 50% तक के टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है। इससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है। रुबियो ने एक टीवी इंटरव्यू में साफ किया कि चीन रूसी तेल को रिफाइन करके उसे यूरोप सहित वैश्विक बाजारों में बेचता है। अगर इस पर पर रोक लगी, तो तेल की आपूर्ति कम हो सकती है, जिससे कीमतें बढ़ेंगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।

भारत पर क्यों सख्ती?

अमेरिका ने भारत पर पहले 25% टैरिफ लगाया था, जिसे अब बढ़ाकर 50% कर दिया गया है। इसका कारण भारत का रूस से सस्ता तेल खरीदना बताया गया है। रुबियो ने कहा कि भारत की यह खरीद रूस के युद्ध प्रयासों को बल दे रही है, जो अमेरिका के लिए चिंता का विषय है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत जैसे बड़े देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए सस्ता तेल जरूरी है। भारत ने इस कदम को अनुचित ठहराते हुए कहा है कि जब यूरोप और चीन भी रूसी तेल से फायदा उठा रहे हैं, तो सिर्फ भारत को निशाना बनाना गलत है। भारतीय अधिकारियों ने साफ किया है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से तेल खरीद बंद नहीं होगी।

चीन को राहत क्यों?

रुबियो ने बताया कि यूरोपीय देशों ने भी चीन पर पाबंदी के खिलाफ चिंता जताई है, क्योंकि वे रिफाइंड रूसी तेल पर निर्भर हैं। अगर चीन पर रोक लगी, तो तेल की सप्लाई चेन टूट सकती है, जिसका असर यूरोप और बाकी दुनिया पर पड़ेगा। इसके अलावा, अमेरिका और चीन के बीच चल रही नाजुक व्यापारिक वार्ताएं भी इसकी एक वजह हो सकती हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में रूस के साथ बातचीत के बाद कहा कि चीन पर तत्काल पाबंदी की जरूरत नहीं है।

भारत की नाराजगी और वैश्विक सियासत

भारत ने अमेरिका के इस रवैये को दोहरा मापदंड बताया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि कई देश रूसी तेल खरीद रहे हैं, फिर भी सिर्फ भारत को सजा दी जा रही है। यह मसला सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक सियासत का हिस्सा है। अमेरिका रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करना चाहता है, लेकिन चीन जैसे ताकतवर देश से टकराव मोल लेने से बच रहा है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भर है, इस जटिल समीकरण में फंस गया है।

क्या है असल खेल?

यह पूरा मामला तेल की कीमतों, वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति का मिश्रण है। अमेरिका एक तरफ रूस पर दबाव बनाना चाहता है, लेकिन चीन के साथ अपने आर्थिक रिश्तों को खतरे में नहीं डालना चाहता। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भर है, इस जटिल समीकरण में फंस गया है। यह स्थिति न सिर्फ भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर रही है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी उथल-पुथल की आशंका जता रही है।

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