वैशाली: बिहार में पहले चरण के चुनाव के लिए 121 विधानसभा क्षेत्रों में नामांकन की प्रक्रिया समाप्त हो गई है। बात करें वैशाली की तो जिले में कुल आठ विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से तीन विधानसभा सीटों पर चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ ले चुका है। यहां महागठबंधन के नेता खुद ही आपस में चुनाव लड़ रहे हैं। एक ओर जहां वैशाली सीट पर कांग्रेस ने दो दिन पहले इंजीनियर संजीव सिंह को प्रत्याशी बनाकर चुनावी मैदान में उतारा है, वहीं अब राजद ने अजय कुशवाहा को टिकट देकर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिया है।
महागठबंधन की यह अंदरूनी जंग अब बाहर आ गई है क्योंकि दोनों उम्मीदवार एक ही गठबंधन से आते हैं लेकिन आमने-सामने चुनाव लड़ रहे हैं। स्थानीय राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं जोरों पर हैं कि यह मुकाबला महागठबंधन के अंदर शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक बन गया है। वैशाली विधानसभा क्षेत्र में पहले से ही एनडीए और स्वतंत्र प्रत्याशी अपनी तैयारी में जुटे थे लेकिन अब गठबंधन के भीतर की यह टक्कर पूरे समीकरण को बदल चुकी है।
वैशाली जिले का दूसरा विधानसभा क्षेत्र राजापाकर
वैशाली जिले के राजापाकर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की वर्तमान विधायक प्रतिमा कुमारी दास ने महागठबंधन समर्थित कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में राजापाकर सीट से अपना नामांकन दाखिल किया है। माना जा रहा था कि यह सीट महागठबंधन के हिस्से के रूप में कांग्रेस को तय हो चुकी थी लेकिन नामांकन के आखिरी दिन कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के मोहित पासवान ने भी नामांकन दाखिल कर राजनीतिक समीकरण को हिला दिया है। दोनों उम्मीदवार महागठबंधन से माने जाते हैं, लेकिन अब वे सीधे तौर पर एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी बन गए हैं। यह स्थिति महागठबंधन के भीतर गहरी असहमति को उजागर करती है।
प्रतिमा दास का कहना है कि कांग्रेस की जारी सूची के अनुसार मुझे सिंबल दिया गया है। राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक राजापाकर की यह सीट अब सिर्फ चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि गठबंधन की एकता को साबित करने की कसौटी बन चुकी है।
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वैशाली जिले का तीसरा विधानसभा क्षेत्र लालगंज
कांग्रेस ने वैशाली जिले की लालगंज सीट से आदित्य कुमार उर्फ राजा बाबू को अपना प्रत्याशी घोषित किया था। लेकिन अब राजद ने यहां से बड़ा दांव चलते हुए पूर्व विधायक बाहुबली मुन्ना शुक्ला और अन्नु शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला को टिकट दे दिया है। इससे लालगंज का चुनावी माहौल पूरी तरह बदल गया है। एक ही गठबंधन के दो उम्मीदवारों के आमने-सामने आने से कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति बन गई है। आदित्य कुमार को जहां कांग्रेस से ईबीसी वर्ग के कारण समर्थन मिल रहा है, वहीं शिवानी शुक्ला को अपने माता-पिता की सियासी विरासत और राजद के कोर वोट बैंक का सहारा प्राप्त है।
स्थानीय मतदाताओं का कहना है कि अब यह मुकाबला महागठबंधन के दो गुटों के बीच प्रतिष्ठा की जंग बन गया है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह सीट अब किसी एक उम्मीदवार की नहीं, बल्कि पूरे गठबंधन की रणनीति की परीक्षा बन चुकी है। अगर मतों का बंटवारा हुआ तो इसका सीधा फायदा भाजपा उम्मीदवार को मिल सकता है।



