कहलगांव
भागलपुर: बिहार के भागलपुर जिले की एक महत्वपूर्ण विधानसभा सीट है, जो भागलपुर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। यह क्षेत्र गोराडीह और सोनहोला प्रखंडों तथा कई ग्राम पंचायतों और कहलगांव नगर पंचायत से मिलकर बना है। स्वतंत्रता के बाद से अब तक यहां 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से 11 बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। यह सीट लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रही, खासकर दिवंगत नेता सदानंद सिंह के नेतृत्व में, जिन्होंने रिकॉर्ड 9 बार यहां से विधायक चुने गए। हालांकि, हाल के वर्षों में बीजेपी और अन्य दलों का प्रभाव बढ़ा है। वर्ष 2020 में यह सीट बीजेपी के पाले में आई थी।
ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्वता
बिहार के भागलपुर जिले की कहलगांव विधानसभा सीट अपनी ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्वता के कारण हमेशा चर्चा का केंद्र रही। कहलगांव 1494 से 1505 तक लगभग 11 वर्षों तक जौनपुर सल्तनत की निर्वासित राजधानी रही। यही बंगाल के अंतिम शासक महमूद शाह की समाधि है। महमूद शाह शेरशाह सूरी से युद्ध में पराजय के बाद यहीं वीरगति प्राप्त हुए थे। ब्रिटिश शासनकाल में कहलगांव को ‘कॉलगोंग’ कहा जाता था और यह नील की खेती, भंडारण और व्यापार का केंद्र था। अंग्रेज अधिकारियों ने स्थानीय किसानों को पारंपरिक फसलों जैसे धान, गेहूं और दालों के स्थान पर जबरन नील की खेती करने पर मजबूर करते थे। वर्तमान में एसएसवी कॉलेज, तब नील के भंडारण का स्थल था। गंगा किनारे स्थित कहलगांव की उपजाऊ भूमि हमेशा से कृषि के लिए अनुकूल रही है। 1951 में कहलगांव विधानसभा क्षेत्र स्थापित हुआ है। इस विधानसभा में अभी तीन प्रखंड कहलगांव, सनहौला, गोराडीह के लगभग 46 ग्राम पंचायत और कहलगांव नगर पंचायत शामिल है। अब तक हुए 17 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने 11 बार जीत हासिल की है। जनता दल ने दो बार, जबकि सीपीआई, एक निर्दलीय, जद(यू), और भाजपा ने एक-एक बार जीत दर्ज की है।
कांग्रेस का गढ़ रहा
यह सीट कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन राजनीतिक परिदृश्य में हालिया बदलावों ने इसे किसी भी पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यहां पर पहला चुनाव 1951 में हुआ था। जिसमें कांग्रेस के रामजन्म महतो विजयी हुए। 1967 में कांग्रेस को पहली हार का सामना करना पड़ा, जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने उन्हें पराजित किया, लेकिन इसके बाद कांग्रेस ने लगातार तीन चुनावों में जीत दर्ज कर अपना दबदबा कायम रखा। हालांकि वर्तमान में यह सीट भाजपा के नियंत्रण में है, जो राज्य की बदलती राजनीतिक दिशा को दर्शाता है। हालांकि कांग्रेस के दिवंगत दिग्गज नेता सदानंद सिंह यहां से रिकॉर्ड 9 बार जीते। जदयू और भाजपा में सीट बंटवारे को लेकर इसबार खींचतान चल रही है। 2020 के विधानसभा चुनाव ने कहलगांव का चुनावी परिदृश्य बदल दिया। BJP के पवन कुमार यादव ने कांग्रेस के शुभानंद मुकेश को 42,893 वोटों के बड़े अंतर से हराकर सीट पर कब्जा किया। पवन कुमार यादव को कुल 1,15,538 वोट मिले, जबकि शुभानंद मुकेश को 72,645 वोट ही मिले। पिछले चुनाव में महागठबंधन से कांग्रेस के उम्मीदवार रहे शुभानंद मुकेश अब जदयू में शामिल हो चुके हैं। वे जदयू के प्रदेश महासचिव हैं, इनका भविष्य क्या होगा, यह भी इस चुनाव में तय होगा। क्योंकि सीट पर अभी भाजपा के पवन यादव विधायक हैं और यही से चुनाव लड़ने की तैयारी शोभानंद मुकेश भी कर रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी अपने पैतृक गांव में सुभानंद मुकेश बुला चुके हैं, एक तरह से कह सकते हैं कि उन्होंने अपना शक्ति प्रदर्शन भी किया है.
सीट बंटवारे को लेकर लग रहे कयास
इसबार महागठबंधन की तरफ से यह सीट किसके खाते में जाएगी, यह तो आने वाला समय बताएगा। इस सीट पर पूर्व से ही कांग्रेस लड़ते आई है लेकिन इस बार राजद ने भी दावा ठोक दिया है। इस बार कांग्रेस से यहां लगभग आधे दर्जन से अधिक उम्मीदवार दिल्ली -पटना दौड़ रहे हैं, वहीं राजद से तीन से चार उम्मीदवार दावेदारी पेश कर रहे हैं। सबसे मजबूत दावेदार की यदि बात की जाए तो कांग्रेस से प्रवीण कुशवाहा और राजद से रजनीश यादव के नाम की चर्चा। रजनीश यादव संजय यादव के बेटा है। संजय यादव झारखंड मंत्रिमंडल में राजद कोटे से मंत्री हैं और उनका घर बिहार के बांका जिले के ढाका मोड में है। वे भी अपने पुत्र के लिए क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं जबकि भाजपा और जदयू से एक- एक दावेदार हैं। भाजपा से पवन यादव जो सेटिंग हैं और जेडीयू से शोभानंद मुकेश जो पिछले चुनाव कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ चुके है।
कहलगांव विधानसभा मुस्लिम, यादव बाहुल्य है
कहलगांव विधानसभा क्षेत्र की सामाजिक संरचना भी राजनीतिक रणनीतियों में निर्णायक भूमिका निभाती है। यह सीट मुस्लिम और यादव बाहुल्य है, जो चुनावी नतीजों पर असर डालते हैं। इसके अलावा ब्राह्मण, कोइरी, रविदास और पासवान जैसे अन्य समुदाय भी पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं। 2025 के चुनाव में इस सीट पर नजरें मुस्लिम-यादव वोट बैंक, पिछली राजनीतिक जीत और भाजपा व कांग्रेस के रणनीतिक समीकरण पर टिकी होंगी। इतिहास और सामाजिक समीकरण को देखते हुए यह सीट बिहार विधानसभा चुनाव के सबसे निर्णायक क्षेत्रों में से एक बनती जा रही है।
2020 के विधानसभा चुनावों में यहां 3,31,391 पंजीकृत मतदाता थे, जो 2024 के लोकसभा चुनावों में बढ़कर 3,51,490 हो गए। यहां अनुसूचित जाति के 11.71%, अनुसूचित जनजाति के 1.12%, और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 18.1% है. केवल 6.95% मतदाता शहरी क्षेत्र से आते हैं।
कांग्रेस 11 बार जीत हासिल की
अब तक हुए 17 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने 11 बार जीत हासिल की है। जनता दल ने दो बार, जबकि सीपीआई, एक निर्दलीय, जद(यू), और भाजपा ने एक-एक बार जीत दर्ज की है। पिछले छह चुनावों में एक स्पष्ट प्रवृत्ति यह रही है कि कांग्रेस दो बार जीतती है और फिर हार जाती है, जैसे 2000 और फरवरी 2005 में जीत मिली, लेकिन अक्टूबर 2005 में जद(यू) विजय रही। फिर कांग्रेस ने 2010 और 2015 में जीत दर्ज की, जिसके बाद 2020 में भाजपा ने सीट पर कब्जा किया।



