IIT कानपुर का बायोसेंसर दवाओं के प्रभाव को करेगा ट्रैक

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अनोखा सेंसर तैयार किया है। यह तकनीक खासतौर पर जी-प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स (GPCR) नामक प्रोटीनों पर फोकस करती है, जो हमारे शरीर में दवाओं की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। कल्पना कीजिए, डॉक्टर अब दवाओं के असर को सीधे कोशिकाओं में देख सकेंगे, जिससे इलाज ज्यादा सटीक और प्रभावी हो जाएगा।

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नई दिल्ली: विज्ञान और तकनीक की दुनिया में एक बड़ी सफलता हासिल हुई है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अनोखा सेंसर तैयार किया है, जो शरीर की कोशिकाओं पर दवाओं के प्रभाव को पल-पल की जानकारी दे सकता है। यह तकनीक खासतौर पर जी-प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स (GPCR) नामक प्रोटीनों पर फोकस करती है, जो हमारे शरीर में दवाओं की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। कल्पना कीजिए, डॉक्टर अब दवाओं के असर को सीधे कोशिकाओं में देख सकेंगे, जिससे इलाज ज्यादा सटीक और प्रभावी हो जाएगा।

GPCR रिसेप्टर्स का महत्व: क्यों हैं ये इतने खास?

GPCR हमारे शरीर के सबसे बड़े प्रोटीन परिवार से ताल्लुक रखते हैं। ये रिसेप्टर्स कोशिकाओं की सतह पर मौजूद रहते हैं और दवाओं, हार्मोन्स या अन्य संकेतों को ग्रहण करके शरीर की विभिन्न प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। आज बाजार में उपलब्ध लगभग 30-40% दवाएं इन्हीं GPCR पर काम करती हैं, जैसे कि हृदय रोग, कैंसर या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दवाएं। लेकिन अब तक इनकी गतिविधि को जीवित कोशिकाओं में रीयल टाइम में मापना एक बड़ी चुनौती था। IIT कानपुर की यह खोज इसी समस्या का समाधान लेकर आई है, जो दवा अनुसंधान को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है।

सेंसर कैसे करता है काम: सरल शब्दों में समझिए

यह बायोसेंसर एंटीबॉडी-बेस्ड तकनीक पर आधारित है, जिसमें नैनोबॉडी का इस्तेमाल किया गया है। जब कोई दवा GPCR रिसेप्टर को सक्रिय करती है, तो वह ‘अरेस्टिन’ नामक एक प्रोटीन से जुड़ जाता है। इस दौरान एक एंजाइमेटिक रिएक्शन होती है, जो प्रकाश (ल्यूमिनेसेंस) पैदा करती है। वैज्ञानिक इस प्रकाश को मापकर रिसेप्टर की गतिविधि का पता लगा सकते हैं। सबसे अच्छी बात? इस सेंसर को रिसेप्टर में कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं पड़ती, यह सीधे प्राकृतिक अवस्था में काम करता है। इससे बीमारियों के दौरान रिसेप्टर्स की स्थिति को इमेजिंग करना आसान हो जाता है, और वैज्ञानिक देख सकते हैं कि दवा कोशिका के किस हिस्से पर असर कर रही है और आगे क्या प्रक्रियाएं शुरू हो रही हैं।

शोध का नेतृत्व: प्रोफेसर अरुण शुक्ला की दस साल की मेहनत

इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व IIT कानपुर के जैविक विज्ञान और जैव इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अरुण के. शुक्ला ने किया है। वे पिछले एक दशक से GPCR की जटिल दुनिया पर रिसर्च कर रहे हैं। प्रोफेसर शुक्ला बताते हैं कि यह सेंसर न सिर्फ रिसेप्टर्स की सक्रियता को ट्रैक करता है, बल्कि दवा विकास के लिए नए रास्ते खोलता है। उनकी टीम में पीएचडी छात्र अनु दलाल समेत कई युवा शोधकर्ता शामिल हैं, जैसे पारीश्मिता शर्मा, मनीष यादव, सुधा मिश्रा, नश्रह जैदी, दिव्यांशु तिवारी, गार्गी महाजन और नबरून रॉय। यह सहयोग चेक गणराज्य के इंस्टीट्यूट ऑफ ऑर्गेनिक केमिस्ट्री एंड बायोकेमिस्ट्री के प्रोफेसर जोसेफ लाजर की टीम के साथ हुआ है, और भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने इसमें सपोर्ट किया।

भविष्य की संभावनाएं: नई दवाओं और थेरेपी में क्रांति

यह खोज दवा उद्योग के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है। अब वैज्ञानिक बीमारियों से जुड़े GPCR की गतिविधि को बेहतर समझ सकेंगे, जिससे लक्षित दवाएं बनाना आसान होगा। उदाहरण के लिए, कैंसर या न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स में यह तकनीक नई थेरेपी विकसित करने में मदद करेगी। शोध के नतीजे अमेरिका की प्रसिद्ध पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (PNAS) में छपे हैं, जो इसकी विश्वसनीयता को और मजबूत बनाता है। IIT कानपुर की यह उपलब्धि दिखाती है कि भारतीय वैज्ञानिक अब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य और विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। यह विकास न केवल चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाएगा, बल्कि मरीजों के लिए बेहतर इलाज के दरवाजे खोलेगा। अगर आप दवा अनुसंधान या बायोटेक में रुचि रखते हैं, तो इस तरह की खोजें भारत को ग्लोबल लीडर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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