भागलपुर: भागलपुर जिले में लैब में उगाए गए G -9 केले की खेती को बढ़ावा देने की योजना है। स्वाद में बेजोड़ होने के साथ यह ज्यादा पैदावार के लिए भी जानी जाती है। टिशू कल्चर तकनीक से विकसित यह रोग-प्रतिरोधी किस्म कम समय (9-10 महीने) में फसल देती है। वहीं, आंधी-तूफान में भी कम नुकसान होता है। इसकी खेती से किसानों को अच्छा मुनाफा हो सकता है। प्रति हेक्टेयर लागत लगभग 1.25 लाख रुपये होती है, जबकि मुनाफा 3.5-4 लाख रुपये तक हो सकता है। सरकार 50-75 प्रतिशत तक अनुदान दे रही है, और कई जिलों में 15-50 हेक्टेयर में इसकी खेती का लक्ष्य रखा गया है।
लैब में उगाये गये (टिश्यू कल्चर) बंबू के बाद अब जिले में भी जी-9 स्ट्रेन टिश्यू कल्चर केले की खेती होगी। जिले में इस नई प्रजाति वाले केले की खेती का आगाज हो चुका है। कई हेक्टेयर में इसके पौधे लहलहाने लगे हैं। इस प्रजाति के पौधे जल्दी तैयार होंगे, बल्कि ये केले की विभिन्न किस्मों की तुलना में स्वाद में भी बेजोड़ होंगे।
जिला उद्यान पदाधिकारियों के अनुसार, इसकी खेती जिले में केले की खेती में आमूलचूल परिवर्तन कर देगी और किसानों की आय को दोगुनी करने में सक्षम होगी। जिला उद्यान पदाधिकारी मधु प्रिया ने बताया कि जिले में 225 हेक्टेयर में जी-9 स्ट्रेन टिश्यू कल्चर केले की खेती का लक्ष्य रखा गया है। एक हेक्टेयर में 3029 जी-9 स्ट्रेन टिश्यू कल्चर केले का पौधा लगता है। इस हिसाब से इस प्रजाति के केले के पौधे न केवल तैयार किए जा चुके हैं, बल्कि प्रखंड स्तर पर 26 जुलाई से इसके पौधे का वितरण भी शुरू कराया जा चुका है। अब तक जिले में 20 हेक्टेयर में जी-9 स्ट्रेन टिश्यू कल्चर केले का पौधा लगाए जा चुके हैं। जबकि इसकी खेती करने के लिए जिले के 500 किसानों के आवेदन अब तक विभाग को मिल चुके हैं। इसके अलावा जिले में पांच हेक्टेयर में चीनीया प्रजाति के केले का पौधा लगाया जाना है।
G-9 स्ट्रेन टिश्यू कल्चर केले की खेती का तरीका
टिश्यू कल्चर तकनीक में पौधों के टिश्यू का छोटा टुकड़ा उसके बढ़ते हुए ऊपरी हिस्से से लिया जाता है। इस टुकड़े को जैली जै में रखा जाता है, जिसमें पोषक तत्व व प्लांट हार्मोंस होते हैं। ये हार्मोन पौधे के टिश्यू में कोशिकाओं को तेजी से विभाजित करते हैं और इनसे कई कोशिकाओं का निर्माणर्मा होता है। इससे पौधे का विकास आम तकनीक से खेती करने से ज्यादा होता है। केले के किसान राम उजागर मंडल कहते हैं कि इसकी खेती के लिए पौधे की उपलब्धता से ज्यादा इसकी खेती-किसानी का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।



