सुपौल: कोसी की बाढ़ की विभीषिका झेलने वाला सुपौल जदयू (जनता दल यूनाइटेड) के मजबूत पोल का उखाड़ पाना विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती साबित हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सुपौल सीट पर जदयू के दिलेश्वर कामत ने राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के चंद्रहास चौपाल को हराकर जीत हासिल की थी। वहीं, 1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रमोद कुमार सिंह को सिर्फ 4256 वोटों से हराकर बिजेंद्र प्रसाद यादव ने सुपौल को फतह कर ऐसा अभेद्य किला बनाया कि अब तक प्रतिद्वंद्वी उसे ढहा नहीं पाये है। 1990 के बाद से बिजेंद्र प्रसाद यादव की जीत जीत का सिलसिला तो जारी ही रहा, बल्कि जीत का अंतर भी लगातार बढ़ता गया। इस दौरान उनके प्रतिद्वंद्वी बदलते रहे। सुपौल जदयू का सुरक्षित या अभेद्य किला बना रहा। इस बार भी चुनाव में महागठबंधन के लिए इसे भेद पाना बड़ी चुनौती होगी।
तीन दशकों में बड़े बदलाव
हर साल कोसी की बाढ़ की विभीषिका झेलने वाला सुपौल में बीते तीन दशकों में बड़े बदलाव आए हैं। यह अनुमंडल से जिला बना। फिर भी कई समस्याएं अभी भी मुंह बाए खड़ी हैं। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और भ्रष्टाचार सरीखे बुनियादी मसले अहम हैं। बाकी कोर कसर कोसी की बाढ़ पूरा कर देती है। इससे हर साल उजड़ना भी इनकी नियति बन गई है।
पहले चुनाव से ही विधान सभा वजूद में
करीब 458 वर्ग किमी में फैली यह विधानसभा आजादी के बाद ही अस्तित्व में आ गई थी। पहली बार हुए चुनाव (1952) में सुपौल सीट से कांग्रेस के लहटन चौधरी ने जीत हासिल की थी। अभी तक के 17 चुनावों में कांग्रेस को छह, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को दो, जनता पार्टी को एक, जनता दल को दो और जदयू को छह बार जीत मिली है। बिजेंद्र 1990 और 1995 में जनता दल, जबकि 2000 से लेकर 2020 तक कुल छह बार जदयू के टिकट पर चुनाव लडक़र जीते।
जदयू का यह वर्चस्व सुपौल की सभी विधानसभा सीटों पर दिखता है, जहां संगठनात्मक ताकत और स्थानीय नेताओं का प्रभाव महागठबंधन के लिए मुश्किलें खड़ी करता है। महागठबंधन, जिसमें राजद, कांग्रेस और अन्य दल शामिल हैं, को इस दुर्ग को भेदने के लिए न केवल मजबूत रणनीति बल्कि स्थानीय मुद्दों पर गहरी पकड़ और एकजुटता की जरूरत है।
चुनाव आयोग की नजर में सुपौल
कुल वोटर: 3,18,016
पुरूष वोटर: 1,64,251
महिला वोटर: 1,53,762
थर्ड जेंडर: 3



