पटना: जनता दल से अलग होकर 28 नवम्बर 2000 को लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) बनाने वाले रामविलास पासवान के बारे में कहा जाता है कि वे एक ऐसे राजनीतिक ज्योतिष थे, जो समय से पूर्व ही राजनीतिक हवा का रुख पहचान लेते थे। इसी कारण वे अधिकांश समय सत्ताधारी दल के साथ गठबंधन में बने रहे। उनके देहावसान के बाद उनके भाई और पुत्र दोनों ने अलग-अलग दल का गठन किया।
2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन न होने के बावजूद चिराग पासवान का भाजपा के प्रति आक्रामक न होना, स्वयं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘हनुमान’ कहना, बिहार चुनाव से पूर्व रथयात्रा निकालकर माहौल बनाना, यह सब उनके राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण है। इस बार एनडीए गठबंधन में जदयू और भाजपा के बाद सबसे ज्यादा सीटें प्राप्त करना यह दर्शाता है कि चिराग ने भी अपने पिता के राजनीतिक चिराग को जलाए रखने में कोई कमी नहीं छोड़ी है।
एनडीए में अभी भी कलह बरकरार!
हालांकि सीटों के बंटवारे पर एनडीए में अब भी अंदरूनी कलह जारी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सबकुछ अभी फाइनल नहीं हुआ है। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज की तारीख में चिराग एनडीए के असली “चिराग” साबित हुए हैं। बिहार की राजनीति में चिराग पासवान का उभार एक सम्मोहन की तरह है, जो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को विरासत से जोड़ता है। अपने पिता के निधन के बाद घर के भीतर की राजनीतिक उलझनों को सुलझाने के प्रयासों के बीच, चिराग ने असफलताओं और सफलताओं के बीच खुद को स्थापित करने का जो सफर तय किया है, वह उनके लचीलेपन और धैर्य का प्रमाण है।
पिता की तरह राजनीति में दिखी झलक
बिहार की राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले रामविलास पासवान के निधन के बाद चिराग एक समय अपने पिता की विरासत और उम्मीदों के जाल में उलझे नजर आए। 1977 में आपातकाल के बाद जब रामविलास पासवान ने पहली बार हाजीपुर से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा, तो उन्होंने जीत के अंतर के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। 4,24,000 वोटों के अंतर से जीत और 89.3% मत प्रतिशत के साथ। यह आज भी भारतीय आम चुनाव के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। रामविलास दलित हितों के कट्टर समर्थक होने के साथ-साथ सवर्ण आरक्षण के पक्ष में भी आवाज उठाने वाले नेता रहे।
कठिन शुरुआत लेकिन दृढ़ इरादा
जब चिराग ने राजनीति में कदम रखा, तब उनके पिता का प्रभाव स्पष्ट झलकता था। 2020 का विधानसभा चुनाव उनके लिए कठिन शुरुआत साबित हुआ। उन्होंने अकेले दम पर 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, पर पार्टी केवल एक सीट जीत सकी और उसे महज छह प्रतिशत वोट मिले। इस हार के बाद विश्लेषकों ने उन्हें “राजनीतिक आकर्षण खो चुके नेता” के रूप में देखना शुरू किया।
रणनीतिक समझ से बनाया दबाव
हालांकि चिराग यह संदेश देने में सफल रहे कि उनके उम्मीदवारों के कारण जदयू को कई सीटों पर हार झेलनी पड़ी। यही उनके लिए राजनीतिक दबाव बनाने का आधार बना। भले ही कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि वे रामविलास के करिश्मे की बराबरी नहीं कर सकते, लेकिन उन्होंने पासवान और दुशाद समुदाय, जो बिहार में लगभग पांच प्रतिशत है, में अपनी पकड़ बनाए रखी।
2020 की निराशा से सीखा सबक
2020 के चुनाव की निराशा ने चिराग को तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत किया। उन्होंने परिस्थितियों में झुकना सीखा, जैसे बांस आंधी में झुकता है पर टूटता नहीं। चिराग ने नई ऊर्जा के साथ अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ानी शुरू की और युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को केंद्र में रखते हुए अपनी दृष्टि को पुनः परिभाषित किया।
लोकसभा चुनाव बना टर्निंग पॉइंट
2024 का लोकसभा चुनाव चिराग के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस बार वे एनडीए गठबंधन का हिस्सा बने और पांच सीटों पर उनकी पार्टी ने शत-प्रतिशत सफलता हासिल की। इस शानदार प्रदर्शन ने आलोचकों को चुप करा दिया और एनडीए में उनकी स्थिति को मजबूत किया। यह पुनरुत्थान इस बात का संकेत था कि चिराग अब अपनी नई राजनीतिक पहचान गढ़ने को तैयार हैं।
सौदेबाजी की कला में भी पिता जैसे
रामविलास पासवान गठबंधन राजनीति में सौदेबाजी के माहिर माने जाते थे। उन्होंने हमेशा अपनी पार्टी को सत्ता समीकरण में प्रभावशाली बनाए रखा। अब चिराग भी उसी राह पर हैं। उन्होंने एनडीए के भीतर अपने प्रभाव को बढ़ाया है। राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ उनकी बातचीत को एक रणनीतिक कदम माना गया, जिसने उनके बढ़ते आत्मविश्वास और सौदेबाजी की ताकत को उजागर किया। उन्होंने प्रशांत किशोर से संवाद कायम रखकर एनडीए पर भी दबाव बनाने में सफलता पाई। साथ ही, खुद को प्रधानमंत्री मोदी का “हनुमान” बताते हुए वे राजनीतिक तौर पर दोनों पक्षों को साधने में सफल रहे।
2025 चुनावों में दिखा असर
यह रणनीतिक पैंतरेबाज़ी 2025 के चुनावों में रंग लाई, जब वे एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरे और लोजपा को प्रभावशाली 29 सीटें दिलाईं। यह परिणाम उनके राजनीतिक कौशल और धैर्य का प्रमाण था।
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दलित राजनीति में नया चिराग
वर्तमान समय में मायावती और जीतन राम मांझी जैसे दलित नेताओं की घटती लोकप्रियता के बीच, चिराग पासवान का उभार एक नए दलित नेतृत्व की ओर संकेत करता है। उनकी समझौतावादी प्रवृत्ति, लचीलापन और समाज में गहरी पैठ यह बताती है कि चिराग भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा राजनीतिक चेहरा बन सकते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार का मत
राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र का कहना है कि “चिराग की बढ़ती लोकप्रियता उनके उज्जवल भविष्य का संकेत है। राजनीति में कब क्या हो जाए कहना कठिन है, लेकिन अब तक का चिराग देखकर यही लगता है कि उन्होंने अपने पिता के जलाए चिराग को भारतीय राजनीति में जलाए रखने में सफलता पाई है।”



