नई दिल्ली: रुमेटॉइड अर्थराइटिस (RA ) को लंबे समय तक जोड़ों का दर्द और सूजन शुरू होने की बीमारी माना गया, लेकिन हाल की एक रिसर्च ने इस सोच को उलट दिया है। अमेरिका के एलन इंस्टीट्यूट, सीयू एंशुट्ज, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो और बेनारोया अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित अपने अध्ययन में खुलासा किया कि यह बीमारी जोड़ों में दर्द शुरू होने से कई साल पहले ही शरीर में चुपके-चुपके अपनी जड़ें जमा लेती है।
रुमेटॉइड अर्थराइटिस की असलियत
यह एक ऑटोइम्यून रोग है, जहां शरीर की रक्षा प्रणाली गलती से अपने ही जोड़ों पर हमला करती है, जिससे सूजन, दर्द, अकड़न और धीरे-धीरे जोड़ों की क्षति होती है। यह मरीजों की रोजमर्रा की जिंदगी को दूभर बना देता है, जिससे चलना-फिरना तक मुश्किल हो जाता है। लेकिन नई खोज बताती है कि यह सिर्फ जोड़ों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली एक जटिल प्रक्रिया है, जो लक्षणों से पहले ही शुरू हो जाती है।
रिसर्च के चौंकाने वाले निष्कर्ष
ज्ञानिकों ने सात साल तक उन लोगों का अध्ययन किया, जिनके खून में एसीपीए एंटीबॉडी थी, यह एक बायोमार्कर है जो आरए के जोखिम को दर्शाता है। नतीजों ने चौंकाया:
- शरीर में पहले से सूजन: लक्षणों से पहले ही पूरे शरीर में गंभीर सूजन शुरू हो चुकी थी, जो आरए मरीजों में देखी जाने वाली सूजन जितनी ही तीव्र थी।
- इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी: बी कोशिकाएं, जो आमतौर पर रक्षा करती हैं, हानिकारक एंटीबॉडी बना रही थीं। टीएफएच17 जैसी टी कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ीं और शरीर के अंगों को नुकसान पहुंचा रही थीं।
- कोशिकाओं का बदलाव: नई टी कोशिकाओं में भी एपीजेनेटिक बदलाव देखे गए, यानी उनके जीन का व्यवहार बदल रहा था, बिना डीएनए में बदलाव के। यह कोशिकाएं बीमारी को बढ़ाने के लिए पहले से तैयार हो रही थीं।
- खून में जोड़ों जैसा व्यवहार: खून की मोनोसाइट्स कोशिकाएं जोड़ों में पाए जाने वाले मैक्रोफेज जैसी सूजन पैदा कर रही थीं, जो बीमारी के शुरुआती संकेत थे।
रोकथाम की नई राह
यह खोज इसलिए क्रांतिकारी है, क्योंकि यह बताती है कि आरए का इलाज लक्षण शुरू होने के बाद शुरू करने की बजाय पहले ही रोका जा सकता है। अगर इन शुरुआती बायोमार्कर्स की समय पर पहचान हो जाए, तो मरीजों को निगरानी और शुरुआती हस्तक्षेप से दर्द और विकलांगता से बचाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन चिकित्सा को प्रतिक्रियात्मक से निवारक दिशा में ले जाएगा।
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भविष्य की उम्मीद
यह रिसर्च चिकित्सा जगत में एक नया दृष्टिकोण देती है। अब तक हम बीमारी को उसके लक्षणों से पकड़ते थे, लेकिन अब शुरुआती संकेतों पर ध्यान देकर लाखों लोगों को इस तकलीफ से बचाया जा सकता है। यह न केवल मरीजों की जिंदगी आसान करेगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाले बोझ को भी कम करेगा। समय रहते कदम उठाना ही इस बीमारी से जंग जीतने की कुंजी है।



