पटना: बिहार की राजनीति में एक नई हलचल मच गई है। प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ ने सोमवार को अपने उम्मीदवारों की दूसरी सूची जारी की, जिसमें छह ऐसे नाम शामिल हैं जिनके नाम के साथ ‘पासवान’ सरनेम जुड़ा है। राजनीतिक गलियारों में इसे केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की LJP(R) के लिए एक सीधी चुनौती और उनके पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
जन सुराज की इस दूसरी सूची में 65 उम्मीदवार हैं, जिसमें सामान्य वर्ग की 46 सीटों के अलावा 18 अनुसूचित जाति (SC) और एक अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षित सीट पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं। लिस्ट की सबसे खास बात यह है कि इसमें छह पासवान सरनेम टाइटल वाले उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है।
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए जन सुराज पार्टी के उम्मीदवारों की दूसरी सूची!! pic.twitter.com/SuyRGATirS
— Jan Suraaj (@jansuraajonline) October 13, 2025
6 ‘पासवान’ सरनेम उम्मीदवारों को टिकट
- कुशेश्वर स्थान से शत्रुध्न पासवान
- रोसड़ा से रोहित पासवान
- बखरी से डॉ. संजय कुमार पासवान
- हरनौत से कमलेश पासवान
- राजपुर से धनंजय पासवान
- कुटुंबा से महाबली पासवान
चिराग पासवान की राजनीतिक ताकत
यह कदम चिराग पासवान के लिए ‘खतरे की घंटी’ क्यों माना जा रहा है, इसे समझने के लिए बिहार की जातिगत राजनीति को समझना जरूरी है। चिराग पासवान जिस पासवान जाति से आते हैं, वह बिहार में यादवों के बाद दूसरी सबसे बड़ी जाति है। बिहार जाति सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में पासवानों की हिस्सेदारी 5.31 प्रतिशत है। चिराग पासवान को इस जाति का सबसे बड़ा और निर्विवाद नेता माना जाता है।
हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी का स्ट्राइक रेट 100 फीसदी रहा था, जिससे एनडीए में उनकी महत्ता स्थापित हुई। इसी कारण, एनडीए के सीट बंटवारे में उन्हें 29 सीटें मिलीं, जिसके लिए उन्हें मनाने में बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को भी प्रयास करना पड़ा था। यह घटना उनकी राजनीतिक जरूरत को दर्शाती है।
पासवान वोट बैंक में सेंध की कोशिश
हालांकि, जन सुराज द्वारा ‘पासवान’ उम्मीदवारों को उतारने से पासवान वोट बैंक में बंटवारे की आशंका बढ़ गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पासवान समाज का वोट बैंक अब तक हर परिस्थिति में चिराग पासवान के साथ मजबूती से बना रहा है।
लेकिन कुछ राजनीतिक जानकार यह भी कहते हैं कि पासवान समाज में चिराग के प्रति पूर्ण संतुष्टि नहीं है और वे विकल्प के अभाव में ही उन्हें वोट देते हैं। इस असंतोष की एक वजह यह भी बताई जाती है कि लोजपा (रामविलास) ने लोकसभा चुनाव में जो पांच सीटें जीतीं, उनमें से केवल दो ही पासवान समुदाय के थे (चिराग और उनके बहनोई अरुण कुमार)। आलोचकों का तर्क है कि चिराग को अपने परिवार से बाहर के पासवान नेता नजर नहीं आते हैं। अगर जन सुराज इस कथित नाराजगी को भुनाने में सफल होती है, तो यह चिराग पासवान के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकता है।
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कुटुंबा में रोचक मुकाबला
जन सुराज ने केवल पासवान वोट बैंक पर ही निशाना नहीं साधा है, बल्कि सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारकर अन्य वर्गों में भी सेंध लगाने की कोशिश की है।
- हरनौत सीट: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पूर्व विधानसभा सीट (सामान्य सीट) हरनौत से जन सुराज ने कमलेश पासवान को उम्मीदवार बनाया है, जो एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए चुनौती पैदा करता है।
- कुटुंबा सीट: औरंगाबाद की कुटुंबा (SC आरक्षित) सीट पर जन सुराज ने महाबली पासवान को टिकट दिया है। यह सीट वर्तमान में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के पास है। राजेश राम रविदास (चमार) समुदाय से आते हैं, जिसकी आबादी (5.25%) पासवानों के लगभग बराबर है। इस कदम को कांग्रेस द्वारा रविदास नेतृत्व खड़ा करने की कोशिशों के बीच पासवान बनाम रविदास (चमार) की लड़ाई शुरू करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिससे कांग्रेस की राह मुश्किल हो सकती है।



