नई दिल्ली: कल्पना कीजिए, जब एक मां अपने बच्चे को गोद में लेकर सपने बुन रही होती है, तब भी हवा का वो जहरीला धुंध उसकी कोख में घुसकर सब कुछ तबाह कर देता है। वायु प्रदूषण का ये काला साया अब गर्भावस्था के पहले पल से ही फैल चुका है। विकासशील देशों में, खासकर भारत जैसे मुल्कों में, जहरीली हवा न सिर्फ नवजातों की सांसें रोक रही है, बल्कि पूरे जीवन को बीमारियों की जंजीरों में जकड़ रही है। हालिया आंकड़े तो और डराने वाले हैं, दुनिया भर में 2023 में प्रदूषण ने 79 लाख जिंदगियां लील लीं, जिनमें से महज भारत में ही 20 लाख मौतें हुईं। और ये आंकड़े बच्चों की मौतों को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
13 फीसदी बच्चे समय से पहले पैदा हो रहे
वैज्ञानिकों ने साफ-साफ बता दिया है कि ये प्रदूषक कण जैसे पीएम 2.5 मां के फेफड़ों से खून में घुस जाते हैं और सीधे भ्रूण तक पहुंचते हैं। नतीजा? जन्म से पहले ही बच्चे की ग्रोथ रुक जाती है। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक, गर्भवती महिलाओं का प्रदूषित हवा से ज्यादा संपर्क नवजातों के दिमागी विकास को धीमा कर देता है, जिससे बाद में सीखने की क्षमता और याददाश्त पर बुरा असर पड़ता है। भारत में तो हालात और खराब हैं, यहां 13 फीसदी बच्चे समय से पहले पैदा हो रहे हैं, और पीएम 2.5 के उच्च स्तर से कम वजन वाले जन्मों का खतरा 40 फीसदी तक बढ़ जाता है। गरीब परिवारों के बच्चे तो इसकी चपेट में सबसे ज्यादा फंसते हैं, जहां साफ हवा तो दूर, बेसिक हेल्थकेयर भी मुश्किल से मिलता है।
प्रदूषण मां की इम्यूनिटी को कमजोर करता
ये सिर्फ जन्म का मुद्दा नहीं। प्रदूषण मां की इम्यूनिटी को कमजोर करता है, जिससे गर्भपात या मृत जन्म का डर हमेशा मंडराता रहता है। बच्चे पैदा होने के बाद भी बच नहीं पाते। पहले साल में ही सांस की बीमारियां, दस्त या मस्तिष्क संबंधी दिक्कतें उन्हें घेर लेती हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में तो ये हवा फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचाती है, जो बाद में अस्थमा या क्रॉनिक लंग डिजीज का रूप ले लेती है। और लंबे समय में? मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग, ये सबकी जड़ें उसी जहरीली हवा में छिपी हैं। एक रिपोर्ट बताती है कि गर्भावस्था में खराब हवा न सिर्फ बच्चे के वजन को प्रभावित करती है, बल्कि मां के फर्टिलिटी लेवल को भी गिरा देती है।
सर्दियों में AQI 500 पार
दिल्ली जैसे शहरों में तो ये आपदा रोजमर्रा की जिंदगी बन चुकी है। सर्दियों में AQI 500 पार कर जाता है, और मांएं घर से बाहर निकलने से कतराती हैं। लेकिन समाधान क्या? सरकारें नीतियां बना रही हैं, मगर जमीनी स्तर पर बदलाव की जरूरत है। मास्क पहनना, इंडोर प्लांट्स लगाना, या कार पूलिंग जैसे छोटे कदम भी फर्क डाल सकते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि गर्भवती महिलाओं को हवा की क्वालिटी चेक करने वाली ऐप्स यूज करनी चाहिए और डॉक्टरों से नियमित सलाह लेनी चाहिए।



