पटना। बात 1967 की है। कांग्रेस को पूरा विश्वास था कि वह बिहार विधानसभा चुनाव में एक बार फिर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी। अहंकार भी इसी आत्मविश्वास से उपजा था। लेकिन परिणाम उम्मीदों के अनुरूप नहीं आए। 318 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 128 सीटें मिलीं और पहली बार खंडित विधानसभा बनी। विपक्ष ने एकजुटता दिखाई और जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा को मुख्यमंत्री बना दिया। उसी समय उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस को झटका लगा। वहां, भी कांग्रेस पूर्ण बहुमत से दूर रह गई। 425 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को केवल 199 सीटें मिलीं, जबकि बहुमत के लिए 213 सीटें जरूरी थीं। यहां भी विपक्ष ने मिलकर सरकार बनाई।
कांग्रेस की सीटों में आई भारी गिरावट
पिछले चुनाव की तुलना में कांग्रेस की 57 सीटें कम हो गई थीं। इस चुनाव में कांग्रेस को कुल 44,79,460 वोट मिले, जो कुल मतों का 33.09 प्रतिशत था। हालांकि यह मत दूसरी सबसे बड़ी पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (जिसे 23,85,961 वोट मिले) से लगभग दोगुना थे, फिर भी कांग्रेस पूर्ण बहुमत से वंचित रह गई।
पहला प्रयोग था गठबंधन का, असफल रहा
यह बिहार में गठबंधन सरकार का पहला प्रयोग था, जो सफल नहीं हो पाया। इसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, सीपीआई, जनक्रांति दल और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी जैसी पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई। कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी थी, जिसके नेता कर्पूरी ठाकुर थे। लेकिन अन्य दल उनके नाम पर सहमत नहीं हुए।
कर्पूरी को उपमुख्यमंत्री पद से करना पड़ा संतोष
सबसे बड़ी पार्टी के नेता होने के बावजूद कर्पूरी ठाकुर को उपमुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा। यह सरकार एक साल भी नहीं चल सकी। बाद में बीपी मंडल के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी के कुछ सदस्यों ने कांग्रेस का साथ दे दिया। यह सरकार भी केवल 50 दिन चली। इसके बाद कांग्रेस ने तोड़फोड़ के सहारे सत्ता में वापसी कर ली।
गठबंधन से विपक्ष को मिला बल
बिहार में पहली बार बनी गठबंधन सरकार भले सफल न रही, लेकिन इससे विपक्ष का हौसला बढ़ गया। यही सिलसिला आगे भी जारी रहा। 2000 के बाद से बिहार में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और गठबंधन ही राजनीति का आधार बन गया। इसका सबसे अधिक लाभ नीतीश कुमार ने उठाया। 1967 के बाद 1969, 1977 और 1990 में भी गठबंधन सरकारें ही बनीं।
जेपी आंदोलन के बाद व्यक्तिवादी राजनीति
जेपी आंदोलन और उसके बाद के दौर में बिहार की राजनीति वैचारिक कम और व्यक्तिवादी अधिक होती चली गई। पार्टी का महत्व घटता गया और नेताओं का व्यक्तित्व प्रमुख हो गया। इसी दौर में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता उभरे, जिन्होंने पार्टी से ऊपर अपने जनाधार पर भरोसा किया। कांग्रेस के पास कोई प्रभावी चेहरा नहीं बचा, जिसका फायदा क्षेत्रीय दलों ने उठाया और कांग्रेस-भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां गठबंधनों पर निर्भर हो गईं।
2000 के बाद नहीं मिला किसी को पूर्ण बहुमत
2000 के बाद किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। अब हर पार्टी ने इसे बिहार की नीयति मान लिया है और गठबंधन को ही राजनीति का आधार मानकर आगे बढ़ रही है। यहां का पूरा चुनावी गणित गठबंधन पर आधारित है। जिसका गठबंधन मजबूत, उसकी सरकार बनने की संभावना अधिक। 2015 में जदयू और राजद ने कांग्रेस के साथ मिलकर नया प्रयोग किया। इस बार भी दोनों ओर गठबंधन ही मुख्य ताकत के रूप में मौजूद हैं। अब तक प्रदेश में छह गठबंधन आकार ले चुके हैं।
अगड़े-पिछड़े की लड़ाई और 1969 का चुनाव
1967 की सरकार मात्र दो साल चली और 1969 में विधानसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस और कमजोर हुई और 118 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद जो सरकार बनी, वह भी गठबंधन की थी। इस दौरान दो बार सरकार बनी और दोनों ही गठबंधन की। अगड़े-पिछड़े नेतृत्व की लड़ाई में गैर-कांग्रेसी सरकार स्थायी नहीं हो सकी। 16 फरवरी 1970 को इंदिरा कांग्रेस के नेता दारोगा प्रसाद राय के नेतृत्व में पहली सरकार बनी, जिसे पहली बार सीपीआई ने समर्थन दिया।
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1977 में टूटा कांग्रेस का तिलिस्म
1977 तक आते-आते कांग्रेस का जादू टूट चुका था। केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार चली गई और बिहार में कांग्रेस महज 57 सीटें जीत पाई। इस चुनाव में कर्पूरी ठाकुर सांसद चुने गए और उन्हें संयुक्त विधायक दल का नेता बनाया गया। जनता पार्टी की सरकार बनी, जिसमें जनसंघ और लोकदल जैसी पार्टियां शामिल थीं। लेकिन इस सरकार का भी वही हाल हुआ, जो पिछली गैर-कांग्रेसी सरकारों का हुआ था—आंतरिक तकरार और मनमुटाव ने इसे ज्यादा दिन टिकने नहीं दिया। केंद्र की मोरारजी देसाई सरकार भी इसी कारण गिर गई।



