लखनऊ: भारतीय लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील धुरी नैतिक वैधता तभी टिकाऊ बनती है जब सार्वजनिक पद पर बैठे लोग कानून के सर्वोच्च आदर्शों के अनुरुप ही आचरण करें। 130वां संविधान संशोधन विधेयक 2025 इसी कसौटी को संस्थागत रूप देता है। यह निर्णय दोषसिद्धि से पहले सत्ता के नैतिक मानदंड की रक्षा करता है। ठीक उसी तरह से जैसे सिविल सेवाओं में 48 घंटे से अधिक की हिरासत पर डीम्ड संस्पेंशन लागू हो जाता है। उसी तर्ज पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा मंत्री के लिए भी 30 दिन की ऊंच सीमा और पांच वर्ष सजा की दहलीज तय करके विधेयक ने मनमानेपन की आशंका को भी सीमित किया है। वहीं विपक्ष की दलील है कि गिफ्तारी राजनीतिक हो सकती है, 30 दिन की हिरासत किसी भी एजेंसी के दुरुपयोग से हासिल की जा सकती है।
दरअसल, इस तरह के कानून के बारे में देखा जाय तो आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल द्वारा जेल में रहते हुए भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के बाद आवश्यकता महसूस हुई। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई मंत्री या मुख्यमंत्री जेल में जाने के बाद अपना त्याग पत्र न दिया हो। 1996 में लाल कृष्ण आडवाणी का जैन हवाला केस में नाम आया तो उन्होंने लोकसभा से इस्तिफा दे दिया। इसके बाद वे देश के उप प्रधानमंत्री बने। 1997 में चारा घोटाले के आरोप में अपनी गिरफ्तारी से पूर्व लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। बाद में वे रेल मंत्री बने थे। 2001 में रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप जार्ज फर्नाडिस पर लगे तो उन्होंने इस्तीफा दिया। 2001 में ही आय से अधिक संपत्ति के मामले जय ललिता ने, 2010 में सोहराबुद्दीन केस में अमित शाह ने गुजरात के मंत्री पद से त्याग पत्र दिया। 2024 में मनी लाड्रिंग केस में हेमंत सोरेन ने भी झारखंड के मुख्यमंत्री पद से इस्तिफा दे दिया था।
इस संबंध में अमर उजाला सहित कई अखबारों में संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार आलोक शुक्ला का कहना है कि समय के अनुसार हर जगह बदलाव होना जरूरी है। आज की स्थिति में संविधान निर्माता भी इस पर अवश्य विचार करते। इस संशोधन से राजनीति में सूचिता आने की संभावना बढ़ जाएगी, लेकिन इसके साथ ही दुरुपयोग की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। पहले भी सरकारें कई मुद्दों पर अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि कल्याण सिंह के शासन काल में जब अयोध्या का विवादित ढांचा गिराया गया तो पी.वी. नरसिंहा राव ने राजस्थान सहित दूसरे प्रदेशों की भाजपा सरकार को भी बर्खास्त कर दिया था। यह मात्र उदाहरण है। इस तरह के तमाम दुरुपयोग देखने को मिलते हैं। यह निर्भर इस बात पर करता है कि इसका उपयोग कौन कर रहा है। उसकी नीयत क्या है।
वहीं वरिष्ठ पत्रकार और अमृत प्रभात के पूर्व संपादक मुनेश्वर मिश्र का कहना है कि राजनीति में छल और बल का प्रयोग तो हमेशा से होता रहा है। किसी भी अधिकार का दुरुपयोग भी हर काल में हुआ है, लेकिन वर्तमान में यह ज्यादा विकृत रूप धारण कर चुका है। आम आदमी पार्टी ने पहली बार दिखा दिया कि राजनीति में जो सिर्फ दिखाने भर के लिए सूचिता का प्रयोग होता था, वह भी समाप्त हो गयी। पहली बार अरविंद केजरीवाल ने जेल जाने के बाद भी सीएम की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ा। इसके बाद तो निश्चय ही ऐसे कानून की आवश्यकता हर कोई महसूस करने लगा। हालांकि इस नियम में कई अन्य बदलाव की भी जरूरत होनी चाहिए। जैसे पद से हटने के लिए कोई कमेटी का गठन, इस पद पर बैठे व्यक्ति पर आरोप के मामले में जल्द निर्णय आदि की परंपरा होनी चाहिए। इससे दुरुपयोग की संभावना कुछ कम हो सकती है।
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इस 130वें संविधान संशोधन पर वरिष्ठ पत्रकार असम में भी एक दशक तक पत्रकारिता कर चुके लक्ष्मीकांत पांडेय का कहना है कि राजनीति में किसी अधिकार का सदुपयोग कम और दुरूपयोग कम होता है। अब तो राजनीति का ज्यादा विद्रुप रूप देखने को मिल रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो फिर इस तरह के कानून लाने की जरूरत ही नहीं होती। यदि किसी राजनेता पर कोई आरोप लगता है तो यह तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वह अपने पद से इस्तिफा दे दे। पहले के राजनेताओं में ऐसा देखा भी गया है, लेकिन आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने सारी सीमाएं तोड़ दी और इस्तिफा नहीं दिया। इसका कारण यही था कि इस्तिफा देने के लिए कोई कानून नहीं बना।
वहीं राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि दूसरी तरफ यह भी संभावना हर वक्त बनी रहेगी कि जिसके हाथ में पावर होगा, वह इसका दुरुपयोग भी करने लगे। इसका भी अनेकों उदाहरण देखने को मिलता रहा है। इसके उपयोग के लिए भी राजनीतिक सूचिता की जरूरत पड़ेगी। जहां दुरुपयोग हुआ, वहां इस संशोधन से परेशानी बढ़ जाएगी। इसको मूल रूप से देखें तो यदि राजनीतिक सुचिता बनी रहे तो फिर ऐसे कानून की ही कोई जरूरत नहीं है।



