पटना: राजनीति में वंशवादी परम्परा में बिहार नहीं, आंध्रप्रदेश आगे है। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि इस मामले में बिहार चौथे नंबर पर आता है। आंध्र प्रदेश में जहां 34 प्रतिशत सांसद, विधायक और एमएलसी राजनीतिक परिवारों से संबंधित हैं। वहीं 32 प्रतिशत के साथ महाराष्ट्र दूसरे नम्बर पर है। 29 प्रतिशत के साथ कर्नाटक तीसरे नंबर पर आता है। बिहार 27 प्रतिशत के साथ चौथे नम्बर पर आता है।
जहां अपनों को टिकट के लिए बगावत कर बैठते हैं नेता
वहीं जिस बिहार में आज परिवारवाद की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। नेता अपने पुत्र रिश्तेदार को टिकट दिलाने के लिए पार्टी में बगावत कर बैठते हैं। वहीं एक ऐसे नेता भी थे, जिनके पुत्र को पार्टी ने विधानसभा में उतारने का प्रस्ताव दिया और उन्होंने खुद इसका विरोध किया। यह वाकया है 1957 का।
कुछ नेताओं ने जब श्रीकृष्ण बाबू को दी सलाह
उस समय कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उस समय के मुख्यमंत्री और भूमिहार समाज के दिग्गज नेताओं में शामिल श्रीकृष्ण बाबू के बेटे शिवशंकर सिन्हा को विधानसभा चुनाव में उतारने का प्रस्ताव रखा। उसका विरोध खुद श्रीकृष्ण बाबू सिन्हा ने किया और चुनाव लड़ाने से इंकार कर दिया। उन्होंने इस मुद्दे पर कहा कि अगर मेरा बेटा चुनाव लड़ेगा, तो मैं खुद चुनाव नहीं लडूंगा। एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट मिलना चाहिए। भारत में वंशवाद कोई नई बात नहीं है। यहां उत्तर से दक्षिण तक वंशवाद को बोलबाला है। तमिलनाडु में तो पिता एम के स्टालिन मुख्यमंत्री हैं और पुत्र उदयनिधि स्टालिन उपमुख्यमंत्री हैं।
राजद में 42 प्रतिशत विधायक पीढ़ी दर पीढ़ी वाले
बिहार में वंशवाद को आगे बढ़ाने का सर्वाधिक योगदान राष्ट्रीय जनता दल का रहा है। वर्तमान में राजद के 71 विधायकों में से 30 विधायक वंश परंपरा से हैं, जो पार्टी के निवर्तमान विधायकों का 42.25 प्रतिशत है। लालू परिवार की तो लालू यादव के बेटे पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं। वहीं लालू की बेटी मीसा भारती, पाटलिपुत्र सीट से लोकसभा सदस्य हैं। निवर्तमान विधानसभा में राजद की ओर से कम से कम सात ऐसे सदस्य हैं, जिनके परिवार के सदस्य पहले मंत्री रह चुके हैं।
नीतीश खुद करते विरोध, फिर भी कम नहीं
वहीं नीतीश कुमार खुद परिवाद का विरोध करते हैं। इस बार कई लोगों ने उनके पुत्र को राजनीति में उतारने की बात रखी, लेकिन नीतीश ने ऐसा नहीं किया। इसके बावजूद परिवारवाद के मामले में जदयू भी पीछे नहीं है। जदयू के निवर्तमान 44 विधायकों में से 16 (यानी 36.36 प्रतिशत) विधायक वंशवाद की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। कांग्रेस के 19 विधायकों में से चार (यानी 21.25 प्रतिशत) विधायक वंशवादी हैं। वहीं, भाजपा में वंशवादी कम नहीं है।
सात मंत्री भी वंशवादी पृष्ठभूमि के
जदयू-भाजपा राज्य सरकार के सात मंत्री भी वंशवादी पृष्ठभूमि से आते हैं। वंशवादी मंत्रियों की फेहरिस्त में महेश्वर हजारी, शीला कुमारी, विजय कुमार चौधरी और सुनील कुमार तथा भाजपा के नितिन नवीन का नाम शामिल है। मंत्रियों की लिस्ट में बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष रह चुके शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे संतोष सुमन मांझी जैसे नेता शामिल है।
कई पीढ़ी खप गयी राजनीति में
वंशवादियों की लिस्ट में राजद के चौधरी सलाहुद्दीन मंत्री थे। उनके पुत्र महबूब अली सांसद रहे और अब उनके पौत्र युसूफ सलाहुद्दीन विधायक हैं। जदयू के मंत्री अशोक चौधरी, जिनके पिता भी मंत्री थे। जदयू के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री सुमित कुमार सिंह, जिनके पिता और दादा विधायक और मंत्री थे।
राष्ट्रीय दलों में सबसे अधिक वंशवादी परंपरा कांग्रेस में, भाजपा भी कम नहीं
चुनाव अधिकार संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) ने 5,204 मौजूदा सांसदों, विधायकों और विधानपरिषद सदस्यों का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि इनमें से 21 फीसदी राजनीतिक परिवारों से आते हैं और लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व सबसे अधिक 31 प्रतिशत है। राष्ट्रीय दलों में, 20 प्रतिशत मौजूदा प्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि वंशवादी है। कांग्रेस का हिस्सा सबसे अधिक 32 प्रतिशत है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का हिस्सा सबसे कम है, जिसके केवल 8 प्रतिशत सदस्य राजनीतिक परिवारों से हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का 18 प्रतिशत है।



