पटना: इनका वार रूम तैयार है, रणनीति बन रही हैं, कार्यकर्ताओं में उत्साह है, लेकिन आशंका भी है कि पुराने दिन लौटेंगे या नहीं। वह भी ऐसा, जब कभी बिहार में इनकी तूती बोलती थी, वह मुख्य विपक्षी दल हुआ करते थे। बात हो रही है, वामपंथी दलों की, जिनका पिछले विधानसभा चुनाव में अपने गठबंधन के साथियों में जीत का स्ट्राइक रेट से सबसे बेहतर था। कार्यकर्ताओं में उत्साह उसी स्ट्राइक रेट से इस बार है।
1969 और 1972 में क्रमश: 28 और 35 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाने वाला पूरा वामपंथ 2010 में एक सीट पर सिमट गया था, वह भी सिर्फ सीपीआई खाते में गई थी। सीपीआई-एम और सीपीआई-एमएल को योग शून्य था। अगला विधान सभा चुनाव भी बेहतर नहीं रहा। 2015 में मात्र तीन सीट जीत सके। 2020 में महागठबंधन के घटक दल के रूप में चुनाव लड़कर वेंटिलेटर पर चल रहे वामपंथी नेताओं को संजीवनी मिल गयी। लेफ्ट दलाें न आबंटित 29 सीटों में से 16 पर जीते दर्ज की। महागठबंधन में इनका स्ट्राइक रेट सबसे ज्यादा, 55 प्रतिशत था। यही वजह है कि इस बार ये पिछली बार से ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं।
कामरेड रामनरेश पांडे ने कहा, सीट बंटवारे में जनाधार देखना जरूरी
बिहार के सीपीआई सचिव कामरेड रामनरेश पांडेय का कहना है कि टिकट बंटवारे में जनाधार को देखना चाहिए। महागठबंधन में राजद व कांग्रेस के अलावा भाकपा ही सबसे बड़ी पार्टी है, जिसका जनाधारा पूरे राज्य में है। कुछ पार्टियां पिछले चुनाव में भले ही कुछ अधिक सीटें लाने में सफल रही, लेकिन उनका जनाधार सीमित इलाके में ही है। हमें विश्वास है कि हमें सम्मानजनक सीटें मिलेंगी।
बिहार में 1956 में शुरु हुआ वामदलों का उभार
बिहार में वामपंथ के उभार की बात करें तो वामपंथी दलों का राजनीतिक सफर 1956 के बरौली उपचुनाव से देखने को मिलता है, जहां सीपीआई के चंद्रशेखर सिंह ने पहली जीत दर्ज की। इसके बाद सीपीआई ने 1962 में 12 सीटें और 1967 में 24 सीटों पर जीत हासिल की। यह दौर वामपंथ के लगातार उभार का था। वहीं, 1969 में सीपीआई ने 28 सीटें जीतीं और 1972 में 35 सीटों के साथ वह बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बनी। इस दौर में वामपंथ को मजदूरों, किसानों और बुद्धिजीवियों का व्यापक समर्थन मिला, जिससे पार्टी की जमीनी पकड़ मजबूत हुई।

मंडल आंदोलन में आयी कमजोरी
1990 के दशक में जब मंडल आंदोलन शुरु हुआ तो बिहार में वामपंथी विचारों के समर्थन में कमी आयी। सामाजिक न्याय की लड़ाई के आगे वामपंथी विचारधारा पस्त होती गयी। इस दौरान सीपीआईएमएल का उभार अपने अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में अधिक हुआ।
सत्तर के दशक में स्वर्ण काल
वामदलों ने बिहार में अपना सियासी सफर 1956 में शुरू किया। चुनाव में एक सीट पर जीत दर्ज की। इसके बाद 1962 में 12 सीटें जीतीं। 1967 में सीपीआई ने 24 और सीपीएम ने चार सीटों पर जीत दर्ज की। 1969 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई, सीपीआई-एम और सीपीएम ने क्रमश: 25, 3 सीटें व शून्य पर हीं। जबकि 1972 में सीपीआई ने 35 सीटें जीतीं और सीपीएम शून्य पर सिमट गयी।
2005 में वामदल सीमट गये थे एक सीट तक
1977 में सीपीआई ने 21 सीटें व सीपीएम ने 4 सीटें, 1980 विधानसभा में सीपीआई ने 23 और सीपीएम ने छह सीटें, 1985 विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 12 और सीपीआई-एम ने एक सीटें जीती। 1990 में सीपीआई ने 23 सीपीआई-एम 6 सीटें, सीपीआई-एमएल शून्य, 1995 विधानसभा चुनाव में सीपीआई 26, सीपीआई-एम ने 6 सीटें, सीपीआई-एमएल ने छह सीटें जीतीं। 2000 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई की सीटें घटकर पांच पर पहुंच गयी। वहीं, सीपीआई-एम ने पांच और सीपीआई-एमएल ने छह सीटों पर, 2005 में सीपीआई ने तीन सीट, सीपीआई-एम ने एक सीट, सीपीआई-एमएल ने पांच सीटें जीतीं। 2010 में सीपीआई ने एक सीट, सीपीआई-एम और सीपीआई-एमएल शून्य पर सिमट गयी। 2015 में सीपीआई और सीपीआई-एम शून्य पर तथा सीपीआई-एमएल ने तीन सीट पर चुनाव जीता। 2020 के गठबंधन में सीपीआई ने दो, सीपीआई-एम ने दो सीटें और सीपीआई-एमएल ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की।
हाशिए पर चुके वाम दलों को 2020 में मिली संजीवनी
हाशिये पर जा चुके वामपंथ ने 2020 में अपनी सक्रियता काफी बढ़ा दी। उन्होंने छात्र आंदोलनों, किसान मुद्दों और गरीब तबकों की लड़ाई के जरिए 16 सीटों पर जीत हासिल की और वोट प्रतिशत बढ़ाकर 4.6% तक पहुंचाया। ये पार्टियां एक बार फिर जनसरोकारों से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं। इसके बावजूद संसाधनों की कमी, बड़े गठबंधनों में हाशिए पर धकेल दिए जाने और जातीय समीकरणों की राजनीति के चलते इन्हें कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
रहा है गौरवशाली इतिहास
बिहार की राजनीति में वामपंथी आंदोलन का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। 1950-60 के दशक में यह राज्य वाम विचारधारा का मजबूत केंद्र था। मिथिलांचल, शाहाबाद, मगध और पूर्णिया जैसे क्षेत्रों में इनका गहरा जनाधार था। पटना जैसे शहरी इलाकों में भी वाम दलों की मजबूत मौजूदगी देखी जाती थी। बिहार में वामपंथ की वापसी संभव है, लेकिन इसके लिए लगातार जमीनी मेहनत, नेतृत्व की एकता और वैकल्पिक राजनीति का मजबूत खाका पेश करना जरूरी होगा। हालांकि, समय के साथ जातीय राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उभार ने वामपंथ को हाशिए पर पहुंचा दिया. अब 2025 के विधानसभा चुनावों में बड़ा सवाल यही है कि क्या ये दल फिर से जनता के बीच अपनी खोई जमीन हासिल कर पाएंगे या फिर उनकी वापसी 2020 तक ही सीमित रह जाएगी।
बिहार में एक लाल सूर्य का उदय
कामरेड रामनरेश पांडे बताते हैं कि बिहार में 20 अक्टूबर 1939 को मुंगेर में सीपीआई की स्थापना हुई थी। उस समय बिहार-झारखंड अलग नहीं था लेकिन हर जिले में सीपीआई का मजबूत संगठन था। पहले सभी अखबारों ने लिखा था कि ‘बिहार में एक लाल सूर्य का उदय हुआ है’। इस जीत के बाद वामपंथ ने राज्य में अपनी पकड़ और मजबूत की।
किसान-मजदूर आंदोलनों से जुड़ाव के कारण मिला व्यापक समर्थन
बिहार में वामपंथी दलों का जनाधार एक उतार-चढ़ाव भरी कहानी रही है। 1952 से 1970 के दशक तक वामपंथी दलों का बिहार विधानसभा में मजबूत प्रतिनिधित्व था। उस दौर में उनकी सीटें लगातार बढ़ती रहीं और विधानसभा में इनकी गूंज साफ सुनाई देती थी। किसान-मजदूर आंदोलनों से जुड़ाव ने इन्हें व्यापक समर्थन दिलाया। हालाँकि, पिछले कुछ दशकों में उनकी ताकत में गिरावट आई थी, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनावों में वामपंथी दलों ने अच्छा प्रदर्शन किया और अब वे 2025 के चुनावों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।



