गांधी जयंती विशेष: व्यक्ति नहीं, गांधी जी एक विचार हैं

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्म दिन पर हमें आत्म निरीक्षण करना है। लेखक प्रशांत कमल का सवाल है कि क्या हम उनकी कुर्बानियों के साथ इंसाफ कर रहे हैं?

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती, विश्व हृदय में बसे एक महान आत्मा को याद करने का दिन ही नहीं, बल्कि हम भारतीयों के लिए आत्म निरीक्षण का दिन भी है। हमारे लिए आज अपने आप से यह पूछने का दिन भी है कि भारत माता के जिस महान सपूत ने पूरे विश्व को मार्ग दिखाया, क्या हम उनके  कुर्बानियों के साथ न्याय कर रहे हैं? 

आज, 2 अक्टूबर को हम उस युग-प्रवर्तक, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती को नम आंखों और गर्वित हृदय से स्मरण करते हैं। मोहनदास करमचंद गांधी एक साधारण व्यक्ति, जिसने सत्य और अहिंसा की अटल शक्ति से न केवल भारत की स्वाधीनता का सपना साकार किया, बल्कि विश्व की आत्मा को प्रेम, करुणा और मानवता का अमर संदेश दिया। उनका जीवन एक ऐसी दीपशिखा है, जो समय की आंधियों में भी अनवरत जलती है, हमें रास्ता दिखाती है। इस पावन अवसर पर, आइए उनकी वैश्विक महिमा को हृदय से महसूस करें और उस दर्द को भी महसूस करें, जो उनकी मातृभूमि में उनकी विरासत की उपेक्षा से उपजता है।

विश्व के हृदय में गांधीजी

महात्मा गांधी की प्रतिमाएं विश्व के 100 से अधिक देशों में स्थापित हैं। प्रत्येक मूर्ति सत्य और अहिंसा की उस शक्ति की गवाही देती है, जिसने साम्राज्यों को झुकाया। अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में 24 से अधिक प्रतिमाएँ हैं, जिनमें वाशिंगटन डीसी में भारतीय दूतावास के समीप की वह मूर्ति भी शामिल है, जो शांति का प्रतीक बनकर खड़ी है। दक्षिण अफ्रीका में जोहानिसबर्ग का गांधी स्क्वायर, जहां युवा गांधी ने अन्याय के विरुद्ध पहला सत्याग्रह को जन्म दिया।

लंदन के संसद स्क्वायर में 9 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा, जिसका अनावरण कर ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने गांधीजी को श्रद्धांजलि दी थी। जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के पास, सिडनी में ऑस्ट्रेलियाई संसद के निकट, और स्पेन, रूस, तुर्की, ईरान, उज्बेकिस्तान, फिलिस्तीन जैसे देशों में उनकी प्रतिमाएं विश्व को उनकी सार्वभौमिकता का संदेश देती हैं। 87 देशों ने बापू की 150वीं जयंती पर स्मारक डाक टिकट जारी किए। यह उनकी वैश्विक प्रासंगिकता और दुनिया भर ने उनके सम्मान का जीवंत प्रमाण हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित कर गांधीजी की जन्मतिथि को शांति का वैश्विक उत्सव बनाया। नोबेल शांति पुरस्कार समिति के पूर्व महासचिव गीयर लुंडेस्टाड ने कहा था, “गांधी को नोबेल न देना हमारी सबसे बड़ी भूल थी।” दलाई लामा को पुरस्कार बापू की स्मृति को समर्पित था।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में नस्लीय समानता की लड़ाई को गांधीवादी अहिंसा से जीता। वो गांधी को अपनी प्रेरणा मानते थे। नेल्सन मंडेला ने रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष में गांधीजी के सिद्धांतों को हृदय से अपनाया। आंग सान सू की ने म्यांमार में उनके मार्ग को चुना। यूएन महासचिव यू थैंट ने कहा, “गांधीजी के सिद्धांत समय और सीमाओं से परे हैं।” जॉन लेनन जैसे कलाकारों ने उनकी शिक्षाओं को गीतों में ढाला। ये सम्मान, ये श्रद्धांजलियां सिद्ध करती हैं कि गांधीजी एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं, जो विश्व की आत्मा में रचता बसता है।  

दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के हस्तियों ने समय समय पर गांधी के बारे में जो हृदयस्पर्शी उद्गार व्यक्त किए हैं वो न केवल याद करने योग्य है बल्कि अपने बच्चों को बताने सिखाने योग्य है।

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था “आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस का ऐसा व्यक्ति इस धरती पर चला, जिसने आत्मा की शक्ति से विश्व को बदल दिया।” उन्होंने तभी कहा था कि आने वाली पीढ़ी इनके जीवन को एक चमत्कार समझेगी।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था कि  “यीशु ने हमें प्रेम का लक्ष्य दिया, गांधी ने उसे जीने का मार्ग।” वहीं, नेल्सन मंडेला कहते थे  “गांधी ने सिखाया कि अहिंसा से हम अपने शत्रुओं को भी मानवता का पाठ पढ़ा सकते हैं।”

गांधी जी को महात्मा की उपाधि देने वाले विद्वान रबिंद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि “महात्मा ने सिद्ध किया कि सत्य की शक्ति किसी हथियार से कहीं प्रबल है।” नोबेल पुरस्कार साहित्य विजेता महान नाटककार व कुशल राजनीतिज्ञ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था “गांधी एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं, जो युगों तक विश्व को प्रेरित करता रहेगा।”

जिस व्यक्ति को दुनिया के महान हस्तियों ने सर पर बिठाया। पूरी दुनिया जिसे आज भी सम्मान करती है क्या उन्हें उतना ही सम्मान और जगह आज भारत में दिया जा रहा है?

हृदय को चीर देने वाली विडंबना है कि जिस मातृभूमि के लिए गांधीजी ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, वहां आज कुछ लोग विशेषकर सांप्रदायिक और कट्टरवादी विचारधारा से प्रेरित समूह उनकी पवित्र स्मृति को कलंकित करने का दुस्साहस कर रहे हैं। इससे भी ज्यादा दुख की बात है कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी का मौन समर्थन और प्रोत्साहन इन ताकतों को मिल रही है।

नाथूराम गोडसे जैसे हत्यारे को ‘देशभक्त’ कहने की कुत्सित कोशिशें, महात्मा गांधी जी प्रतिमाओं पर हमले, और उनके हिंदू-मुस्लिम एकता के संदेश को ‘हिंदू-विरोधी’ ठहराने की साजिशें ये सब न केवल गांधीजी के प्रति अपमान हैं, बल्कि उस भारत की आत्मा पर प्रहार हैं, जिसे उन्होंने अपने खून और पसीने से सींचा।

विश्व में जहां गांधीजी की अहिंसा ने क्रांतियों को जन्म दिया, दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका तक सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं भारत में कुछ लोग उनकी शिक्षाओं को भुलाकर सांप्रदायिकता और हिंसा के रास्ते पर चल पड़े हैं। यह दृश्य हृदय को मथ देता है, आत्मा को व्यथित करता है।

क्या हम उस महान आत्मा के बलिदान को यूं ही मिट्टी में मिल जाने देंगे, जिसने हमें स्वतंत्रता का स्वाद चखाया?  क्या हम अपनी आंखों के सामने अपनी अमूल्य विरासत को जमींदोज होते हुए देखते रहेंगे? या फिर कुछ करेंगे? आज इन सवालों सोचने गुनने का दिन है।

गांधी जी का संदेश आज भी हमारी अंतरात्मा को झंकृत करता है। सत्य के लिए जियो, अहिंसा को हृदय में बसाओ, और मानवता को सर्वोपरि रखो। उनकी जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक पुकार है, उनके आदर्शों को जीने की, उनके स्वप्नों को साकार करने की। 

आइए, इस पवित्र दिन पर संकल्प लें कि हम गांधीजी की विरासत को गर्व से अपनाएँगे। हम भारत को वह देश बनाएंगे, जो उनकी दृष्टि का साकार रूप हो- शांतिपूर्ण, समावेशी और न्यायपूर्ण। आइए, गांधीजी को नमन करें, और उनके बताए राह पर चलकर दुनिया को दिखाएँ कि उनकी आत्मा आज भी जीवित है। न सिर्फ हमारे दिलों में बल्कि हमारे कर्मों में भी!

प्रशांत कमल
लेखक युवा हल्ला बोल के राष्ट्रीय महासचिव हैं।
विचार उनके अपने हैं।

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