नई दिल्ली: भारत की न्याय व्यवस्था में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सर्वोच्च स्थान पर होते हैं। वे न केवल सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख हैं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र के मुखिया भी हैं। CJI के पास केस आवंटन, बेंच गठन और प्रशासनिक निर्णयों की अहम जिम्मेदारी होती है। सुप्रीम कोर्ट में जजों की सीनियरिटी उनकी नियुक्ति की तारीख से तय होती है। पहले नियुक्त जज को सीनियर माना जाता है, जबकि हाल में नियुक्त जज सबसे जूनियर होते हैं। अगर दो जज एक ही दिन नियुक्त हुए, तो उनकी हाई कोर्ट में सेवा अवधि के आधार पर सीनियरिटी तय होती है। रिटायरमेंट के साथ सीनियरिटी बढ़ती रहती है।
न्यायिक ढांचे की संरचना
भारत की न्याय व्यवस्था एक व्यवस्थित हायरार्की पर आधारित है। सबसे ऊपर सुप्रीम कोर्ट है, जो देश का सर्वोच्च न्यायालय है। इसके बाद हाई कोर्ट आते हैं, जो राज्यों में बड़े मामलों की सुनवाई करते हैं। हाई कोर्ट के नीचे सबऑर्डिनेट कोर्ट है, जिनमें सिविल और सेशन कोर्ट शामिल हैं। सिविल कोर्ट में डिस्ट्रिक्ट जज, एडिशनल जज, असिस्टेंट जज और सिविल जज होते हैं। सेशन कोर्ट में सेशन जज, एडिशनल सेशन जज और चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कार्यरत हैं। ये कोर्ट स्थानीय स्तर पर नागरिक और आपराधिक मामलों का निपटारा करते हैं।
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जजों की नियुक्ति और रिटायरमेंट
सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति कोलेजियम सिस्टम के तहत होती है, जिसमें CJI और चार वरिष्ठ जज सिफारिश करते हैं। राष्ट्रपति इन सिफारिशों को मंजूरी देकर नियुक्ति पूरी करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज 65 वर्ष की आयु में रिटायर होते हैं, लेकिन कई जज रिटायरमेंट के बाद आयोगों या ट्रिब्यूनल्स में योगदान देते हैं। हाई कोर्ट और निचली अदालतों में भी समान प्रक्रिया अपनाई जाती है, जहां अनुभव और योग्यता के आधार पर नियुक्तियां होती हैं।
न्याय तंत्र का महत्व
यह हायरार्की सुनिश्चित करती है कि न्याय व्यवस्था व्यवस्थित, पारदर्शी और कुशल रहे। CJI से लेकर जूनियर जज तक, हर स्तर पर जिम्मेदारियां स्पष्ट है, जो भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करती हैं।



