विचारधारा से ज्यादा अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही कांग्रेस

बिहार में कांग्रेस इस बार ज्यादातर ऐसी सीटों पर लड़ रही है, जहां महागठबंधन हमेशा कमजोर रहा है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस यदि उठ जाती है तो उसके लिए आगे का रास्ता सीना चौड़ाकर चलने के लिए साफ हो जाएगा, लेकिन इसके उम्मीद कम दिखती है। इन सब असमंजस की स्थिति में प्रदेश में कांग्रेस विचारधारा से ज्यादा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र नाथ राय की यह रिपोर्ट।

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पटना: पिछली बार सत्तर सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस इस बार 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन इन सुरक्षित सीटों पर भरोसा नहीं कर सकती। इस बार कांग्रेस बिहार में विचारधारा से ज्यादा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। यदि उसका पिछली बार से ज्यादा स्ट्राइक रेट रहा तो वह आगे महागठबंधन में अपनी आवाज उठाने लायक रहेगी। वरना पुन: उसे शून्य से अपनी कहानी शुरु करनी पड़ेगी। उसकी स्थिति बहुत असमंजस की है, जिससे पूरी ताकत भी नहीं लगा पा रही है। इसका कारण है, उसके 61 सीटों में नौ सीटों पर तो उसके महागठबंधन के दलों से ही लड़ाई है। इसको दोस्ताना संघर्ष का नाम दिये हैं। 52 सीटों पर मुकाबला विपक्षी गठबंधन से है। लेकिन यहां भी कांग्रेस के लिए पेंच फंसा हुआ। इसका कारण है उसकी आधी सीटों पर 2008 में हुए परिसीमन के बाद चुनावों में महागठबंधन का कोई साथी जीत नहीं पाया है।

कांग्रेस के सिर्फ 38 सीटों पर महागठबंधन रहा है टक्कर देने की स्थिति में

सिर्फ 38 सीटें ऐसी हैं, जहां महागठबंधन के दल या तो नजदीकी टक्कर में रहे हैं या तो सिर्फ एक बार जीते हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए ये सीटें काफी मुश्किल राह खड़ी कर रही हैं। पिछली बार महागठबंधन में सबसे कम स्ट्राइक रेट कांग्रेस का ही था। यह सत्तर सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 19 पर ही जीत दर्ज कर सकी थी अर्थात इसके जीत का स्ट्राइक रेट 27 प्रतिशत था। जबकि महागठबंधन में वाम दलों का स्ट्राइक रेट सबसे अधिक 55 प्रतिशत रहा था। अब इस बार डर सता रहा है कि कहीं स्ट्राइक रेट पिछली बार से भी कम हुआ तो फिर बिहार में भी कांग्रेस की स्थिति उप्र के पिछले विधानसभा चुनाव की तरह हासिए पर आ जाएगी।

कांग्रेस के लिए बहुत जटिल चुनाव

राजनीति के जानकारों के अनुसार, कांग्रेस के लिए यह बहुत ही जटिल चुनाव है। इसका कारण है कि वह मजबूत सीटों के बजाय ऐसी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जहां महागठबंधन समाप्त प्राय थी। इससे उसे खुद को पुनर्जीवित करने का रास्ता तो है, लेकिन इससे उसने खुद को करो या मरो की स्थिति में ला दिया है।

राजद को नजरअंदाज करना मुश्किल

इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार राजेश तिवारी इसके दो कारण बताते हैं। पहली यह कि महागठबंधन में राजद प्रमुख भूमिका में है। उसको नजरअंदाज कर कांग्रेस अपने दम पर बिहार में आगे नहीं बढ़ सकती। उसके दबाव में ही कांग्रेस को कमजोर सीटों पर चुनाव लड़ने को मजबूर होना पड़ा। दूसरी यह कि पार्टी अपने संगठन को जिलों तक फिर से जीवित करना चाहती है, ताकि आने वाले लोकसभा चुनावों में वह खुद को एक ‘प्रभावी भागीदार’ साबित कर सके।

राजीव रंजन सिंह ने कहा

राजनीतिक समीक्षक राजीव रंजन सिंह कहते हैं कि कांग्रेस की बिहार में संगठन कमजोर है। इसके साथ ही स्थानीय नेतृत्व का अभाव उसको दूसरी पार्टियों का सहारा लेने को मजबूर कर देता है। वहां कांग्रेस के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जो सभी जिलों में लहर बना सके। पिछले चुनाव में सत्तर सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस का अब 61 पर उतरना रणनीतिक रूप से पीछे हटना माना जा रहा है, लेकिन साथ ही पार्टी का कहना है कि वह कम पर बेहतर की नीति अपना रही है।

निर्णायक साझीदार बन सकती है कांग्रेस

बिहार में कांग्रेस अब विचारधारा से ज़्यादा अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पार्टी को यह साबित करना होगा कि वह केवल ‘सहयोगी दल’ नहीं, बल्कि ‘निर्णायक साझेदार’ बन सकती है। अगर इन 52 सीटों में से 15-20 पर भी जीत दर्ज कर लेती है तो यह उसके लिए बड़ी राहत होगी, लेकिन अगर प्रदर्शन कमजोर रहा तो महागठबंधन में उसका वजन और घट जाएगा। आखिर में यह कि यह चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ सीटों की गिनती का नहीं, बल्कि साख बचाने का चुनाव है। जिन इलाकों में इतिहास अब तक उसके खिलाफ रहा है, वहीं से उसे भविष्य की उम्मीद तलाशनी है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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