पटना: “देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर” यह लोकोक्ति बिहार चुनाव में छोटे दलों पर फिट बैठती है। इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि एनडीए ने जहां 37.26 प्रतिशत कुल वोट पाये थे। वहीं महागठबंधन का वोट प्रतिशत 37.23 प्रतिशत था यानि सिर्फ .03 प्रतिशत वोट प्रतिशत के अंतर ने महागठबंधन को पांच साल का वनवास और नीतीश को फिर से मुख्यमंत्री का पद दे दिया। ये छोटे दल अकेले रहकर शून्य भले रहते हों, लेकिन जिसके साथ जाएंगे, उस एक के साथ मिलकर 10 बना देंगे। यही कारण है कि छोटे दल भी अपने हिसाब से समझौता करने के लिए दबाव बनाये हुए हैं।
पिछले चुनाव में अधिकांश चुनावी पंडित महागठबंधन की सरकार बनने का दावा कर रहे थे, लेकिन सीमांचल की 20 सीटों पर चुनाव लड़कर आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेदाहुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने पूरा खेल बिगाड़ दिया। 20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले एआईएमआईएम को 5,23,279 मत मिले थे। यह कुल पड़े वोट का 1.24 प्रतिशत था।
पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी एआईएमआईएम ने
इन 20 सीटों पर लड़ते हुए ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटों पर विजय प्राप्त की थी। हालांकि बाद में इसके चार विधायक राजद में चले गये, लेकिन इस मत ने बता दिया कि मुस्लिम बहुल इलाकों में ओवैसी के लड़ने से महागबंधन का खेल बिगड़ने में ज्यादा सहयोगी साबित हुई और महागठबंधन दल इसे भाजपा की बी टीम की संज्ञा देने लगे। चुनाव के समय किसी ने इसको गंभीरता से नहीं लिया, जबकि सीमांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में इस पार्टी ने ज्यादा मुस्लिम मतों को प्रभावित कर दिया।
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बसपा ने उतारे थे 78 उम्मीदवार, मिला था 1.49 प्रतिशत मत
बसपा भले राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन बिहार के लिए यह छोटा दल ही है, क्योंकि वहां जनाधार नहीं है। पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपने 78 उम्मीदवार उतारे थे। बसपा के इन उम्मीदवारों को कुल 6,28,961 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 1.49 प्रतिशत था। इसके साथ ही एक सीट पर बसपा को विजय मिली थी। भले ही यह एक सीट हो लेकिन इसके 1.49 प्रतिशत वोट को देखें तो उसमें एक प्रतिशत भी किसी गठबंधन में साथ रहकर उसको डायवर्ट कराने में सफल हो जाती तो पूरा दाव पलटने के लिए काफी था।
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उपेन्द्र कुशवाहा के उम्मीदवार भले न जीते, लेकिन इन्होंने भी किया कमाल
इसी तरह उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने 99 उम्मीदवार उतारे थे। इसके उम्मीदवारों को कुल 7,44,221 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 1.77 प्रतिशत था। इसके बावजूद इसके एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाए थे। इतना जरूर रहा कि इस मत के सहारे इन्होंने कई उम्मीदवारों का खेल बिगाड़ दिया। ये तीन दल मिलाकर जीडीएसएफ नाम से अपना एक गठबंधन बनाये थे। इन तीनों पार्टिंयों को मिलाकर कुल 18,96,457 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 4.50 प्रतिशत था। इन्होंने कुल 197 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें सिर्फ छह उम्मीदवार जीत पाये। चिराग की लोकजनशक्ति पार्टी ने भी अलग चुनाव लड़ते हुए अपने 135 उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें सिर्फ एक उम्मीदवार जीत पाया था। अब ये एनडीए के हिस्सा हैं। अकेले चुनाव लड़कर इस पार्टी ने कुल 23,83,457 मत पाए थे। इस पार्टी का मात्र एक उम्मीदवार जीत पाया था, लेकिन इस पार्टी को कुल पड़े मत का 5.66 प्रतिशत मत मिले थे।
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निर्दलीयों को भी कम न समझिए जनाब
निर्दलीय उम्मीदवारों के मतों को देखें तो कुल पड़े मत का 8.64 प्रतिशत इन्हें मिला था। इन निर्दलीय उम्मीदवारों में कई किसी न किसी दल के बागी नेता रहते हैं, जो उसी दल के उम्मीदवार का अधिकांश वोट काटते हैं। संख्या में इनको कुल 36,41,362 मत मिला था। 1299 खड़े निर्दलीय उम्मीदवारों में मात्र एक निर्दलीय उम्मीदवार जीत पाया था, लेकिन कई उम्मीदवारों का खेल बिगाड़ने के लिए ये काफी थे। नोटा के बारे में यह माना जाता है कि जो सभी दलों से निराश होते हैं, परंतु अपने मताधिकार के प्रति जागरूक रहते हैं, वे नोटा पर मत देते हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी 7,06,252 थी, जो कुल पड़े मत का 1.68 प्रतिशत था।



