पटना: बिहार की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों, गठबंधनों और अप्रत्याशित मोड़ों की कहानी रही है लेकिन 2025 के विधानसभा चुनावों में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी की एंट्री ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को हिल दिया है। पूर्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसे बड़े नेताओं की जीत के सूत्रधार थे। अब खुद ताल ठोकने के लिए चुनावी मैदान में उतर चुके हैं।
मुकाबला त्रिकोणीय
प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान कर चुकी है, जो बिहार के पारंपरिक द्विध्रुवीय मुकाबला एनडीए बनाम इंडिया गठबंधन को त्रिकोणीय बना सकती है। क्या यह नया खिलाड़ी वोट-कटर बनेगा या गेम चेंजर? आइये जानते हैं।
प्रशांत किशोर की जन सुराज यात्रा 2022 से शुरू हुई, जो अब एक पूर्ण राजनीतिक पार्टी में तब्दील हो चुकी है। किशोर ने बिहार को फेल्ड स्टेट करार देते हुए पांच सूत्री एजेंडा पेश किया। प्रवासन रोकना, शिक्षा और रोजगार में सुधार, कृषि विकास, महिल सशक्तिकरण और शासन सुधार। उन्होंने दावा किया है उनकी पार्टी या तो 10 से कम सीटें जीतेगी या 200 से ज्यादा। कोई बीच का रास्ता नहीं है। हाल ही में उन्होंने भविष्यवाणी की कि जेडीयू 25 से कम सीटों पर सिमट जाएगी और नीतीश कुमार किसी भी हाल में सीएम नहीं बनेंगे। अगर जेडीयू 25 से ज्यादा सीटें जीततीी है तो वह राजनीति छोड़ देंगे। यह बयान नीतीश कुमार के लिए चुनौती है, जो पिछले 20 सालों से बिहार की सत्ता के केंद्र में हैं।
चुनावी समीकरणों पर नजर डालें तो जन सुराज का प्रभाव मुख्य रूप से युवा, ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोटरों पर पड़ सकता है। किशोर की रणनीति ग्रासरूट स्तर पर है। वह 5000 गांवों में पैदल घूम चुके हैं और वोट मांगने के बजाए गरीबी से निकलने का रास्ता बताते हैं। हाल को पोल्स जैसे सी-वोटर और मनी कंट्रोल में एनडीए को 46-47 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 140-160 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि इंडिया गठबंधन 35-36 फीसदी और जन सुराज को 9-12 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं जो मुख्य रूप से एनडीए के युवा पुरुष वोट बैंक को इधर-उधर कर सकता है। कुछ जानकारों का मानना है कि यह भाजपा के लिए वोट-कटर साबित होगी।
एनडीए के लि चुनौती
एनडीए के लिए चुनौती बड़ी है। भाजपा-जेडीयू गठबंधन में नीतीश की लोकप्रियता गिर रही है, लेकिन राहत पैकेज और जंगल राज की याद दिलाकर वह मतदाताओं को लुभा रहे हैं। तेजस्वी यादव की आरजेडी सीएम पद के लिए सबसे लोकप्रिय चेहरा है, लेकिन जन सुराज मुस्लि और दलित वोटों को खींच सकती है, जो आरजेडी का मजबूत आधार है। आरसीपी सिंह जैसे पूर्व विरोधियों का जन सुराज में शामिल होना नीतीश के लिए झटाका है। हालांकि, हाल के उपचुनाव में जनसुराज की हार न किशोर की राजनीतिक नौसिखिया होने की कमजोरी को उजागर किया है।
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जनसुराज बिहार की राजनीति को दे रही चुनौती
जनसुराज पार्टी बिहार की जातीय राजनीति को चुनौती दे रही है, लेकिन सफलता संदिग्ध है। प्रशांत किशोर की रणनीति अरविंद केजरीवाल जैसी लगती है। जनता से सीधा संवाद और सुशासन का वादा। अगर जनसुराज पार्टी 12-25 सीटें जीतती है तो किंगमेकर बन सकती है। कुल मिलाकर बिहार का चुनाव त्रिकोणीय होने से एनडीए की राह आसान हो सकती है, लेकिन अप्रत्याशित बिहार में कुछ भी संभव है। चुनाव नवंबर में होने की संभावना है। ऐसे में चुनाव जनसुराज पार्टी की भूमिका तय करेगी बिहार का भविष्य पुरानी सत्ता में रहेगा या या नई क्रांति में।



