नई दिल्ली: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बुधवार को लोकसभा में भारी हंगामे और नारेबाजी के बीच तीन बिल पेश किया। इसके तहत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के गंभीर अपराध के आरोप लगने और 30 दिनों तक जेल जाने की स्थिति में उन्हें पद से हटाया जा सकेगा। बिल पेश करते ही विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया और बिल की कापी फाडक़र अमित शाह के सामने उछाल दी। सदन में हंगामा इतना बढ़ गया कि मार्शल तुरंत शाह की तरफ आ गए और उनकी लिए सुरक्षा घेरा बना लिया।
तीन विधेयक संविधान (130वां संशोधन)विधेयक, केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक और जम्मू-कश्मीर पुर्नठन (संशोधन) विधेयक संसद में पेश किए गए। विपक्ष ने हंगामा करते हुए बिल की प्रतियां फाड़ दी। विपक्ष बिल को वापस लेन की मांग पर अड़ा रहा। बिल की कापी फाड़े जाने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला काफी नाराज हुए और सांसदों से ऐसा नहीं करने के लिए कहा। इस दौरान सदन में अमित शाह और कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल के बीच थोड़ी बहस हुई।
देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के आक्रोश को देख कर आज मैंने संसद में लोकसभा अध्यक्ष जी की सहमति से संवैधानिक संशोधन बिल पेश किया, जिससे महत्त्वपूर्ण संवैधानिक पद, जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री जेल में…
— Amit Shah (@AmitShah) August 20, 2025
इस बीच तीखे माहौल में, कई विपक्षी सांसदों ने विधेयकों के पेश किए जाने का विरोध किया और दावा किया कि ये संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं, संघवाद को निशाना बनाते हैं, दोषी साबित होने तक निर्दोष न्यायशास्त्र को उलट देते हैं, राजनीतिक कारणों से इनका दुरुपयोग किया जा सकता है और देश को पुलिस राज्य में बदलने की धमकी देते हैं।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने एक्स पर सिलसिलेवार पोस्ट्स में कहा कि देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के आक्रोश को देख कर आज मैंने संसद में लोकसभा अध्यक्ष की सहमति से संवैधानिक संशोधन बिल पेश किया, जिससे महत्त्वपूर्ण संवैधानिक पद, जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री जेल में रहते हुए सरकार न चला पाएँ। इन्होंने कहा कि इस बिल का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में गिरते जा रहे नैतिकता के स्तर को ऊपर उठाना और राजनीति में शुचिता लाना है ।
बिल से जो कानून अस्तित्व में आएगा
अमित शाह ने कहा कि इन तीनों बिल से जो कानून अस्तित्व में आएगा, वह यह है। कोई भी व्यक्ति गिरफ्तार होकर जेल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केन्द्र या राज्य सरकार के मंत्री के रूप में शासन नहीं चला सकता है। संविधान जब बना, तब हमारे संविधान निर्माताओं ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि भविष्य में ऐसे राजनीतिक व्यक्ति भी आएंगे, जो अरेस्ट होने से पहले नैतिक मूल्यों पर इस्तीफा नहीं देंगे। विगत कुछ वर्षों में, देश में ऐसी आश्चर्यजनक स्थिति उत्पन्न हुई कि मुख्यमंत्री या मंत्री बिना इस्तीफा दिए जेल से अनैतिक रूप से सरकार चलाते रहे।
इस बिल में आरोपित राजनेता को गिरफ्तारी के 30 दिन के अंदर अदालत से जमानत लेने का प्रावधान भी दिया गया है। अगर वे 30 दिन में जमानत प्राप्त नहीं कर पाते हैं, तो 31वें दिन या तो केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्री उन्हें पदों से हटाएंगे, अन्यथा वे स्वयं ही कानूनी रूप से कार्य करने के लिए अयोग्य हो जाएंगे। कानूनी प्रक्रिया के बाद ऐसे नेता को यदि जमानत मिलेगी, तब वे अपने पद पर पुन: आसीन हो सकते हैं।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि अब देश की जनता को यह तय करना पड़ेगा कि क्या जेल में रहकर किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री द्वारा सरकार चलाना उचित है। उन्होंने कहा कि एक ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने आप को कानून के दायरे में लाने का संविधान संशोधन पेश किया है और दूसरी ओर कानून के दायरे से बाहर रहने, जेल से सरकारें चलाने और कुर्सी का मोह न छोडऩे के लिए मुख्य विपक्षी दल के नेतृत्व में पूरे विपक्ष ने इसका विरोध किया है।
अमित शाह का विपक्ष पर निशाना
अमित शाह ने कहा कि देश को वह समय भी याद है, जब इसी महान सदन में आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संविधान संशोधन संख्या-39 से प्रधानमंत्री को ऐसा विशेषाधिकार दिया कि प्रधानमंत्री के विरुद्ध कोई भी कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती थी। एक तरफ यह मुख्य विपक्षी दल की कार्य संस्कृति और उनकी नीति है कि वे प्रधानमंत्री को संविधान संशोधन करके कानून से ऊपर करते हैं। जबकि, दूसरी तरफ हमारी पार्टी की नीति है कि हम अपनी सरकार के प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्रियों को ही कानून के दायरे में ला रहे हैं।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि आज सदन में मुख्य विपक्षी दल के एक नेता ने मेरे बारे में व्यक्तिगत टिप्पणी भी की, कि जब मुख्य विपक्षी दल ने मुझे पूरी तरह से फर्जी केस में फंसाया और गिरफ्तर कराया, तब मैंने इस्तीफा नहीं दिया। मैं मुख्य विपक्षी दल को याद दिलाना चाहते है कि मैंने गिरफ्तार होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था और बेल पर बाहर आने के बाद भी, जब तक अदालत से पूरी तरह निर्दोष साबित नहीं हुआ, तब तक मैंने कोई संवैधानिक पद नहीं लिया था। मेरे ऊपर लगाए गए फर्जी केस को अदालत ने यह कहते हुए खारिज किया कि केस political vendetta से प्रेरित है।
NDA नैतिक मूल्यों का पक्षधर है
शाह ने कहा कि हमारी पार्टी और हृष्ठ्र हमेशा नैतिक मूल्यों के पक्षधर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले से स्पष्ट था कि यह बिल पार्लियामेंट की संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष रखा जाएगा, जहाँ इस पर गहन चर्चा होगी, फिर भी सभी प्रकार की शर्म और हया छोडक़र, भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए विपक्षी गठबंधन ने जिस भद्दे व्यवहार से इस बिल का विरोध किया, उससे विपक्ष जनता के बीच पूरी तरह से बेनकाब हो गया है।
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विधेयकों को संयुक्त समिति को जांच के लिए भेजा
शाह ने सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों के लिए बेहतर प्रतिष्ठा की वकालत करते हुए कहा, हम इतने बेशर्म नहीं हो सकते कि गंभीर आरोपों का सामना करते हुए भी संवैधानिक पदों पर बने रहें। उनके प्रस्ताव पर, सदन ने विधेयकों को संसद की एक संयुक्त समिति को जांच के लिए भेज दिया, जिसमें लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल थे। इस समिति, जिसके सदस्यों के नाम जल्द ही घोषित किए जाएंगे, को अगले सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक सदन में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है, जो नवंबर के तीसरे सप्ताह में होने की उम्मीद है।
इससे पहले दोपहर 2 बजे के तुरंत बाद विधेयक पेश किए गए, विपक्षी सदस्य नारेबाजी करते हुए आसन के सामने आ गए और कुछ ने तो गृह मंत्री के भाषणों को प्रसारित करने वाले कैमरों में कैद करने के लिए शाह के सामने प्रतियां भी फाड़ दीं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और रवनीत सिंह बिट्टू सहित कुछ भाजपा सदस्य विपक्षी सदस्यों को शाह के पास आने से रोकने के लिए अपनी सीटों से उठ गए और उन्हें अपनी ओर जाने का इशारा किया।
जब कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने 2010 में गुजरात के गृह मंत्री रहते हुए एक आपराधिक मामले में अपनी गिरफ्तारी का हवाला देते हुए शाह से उनके सार्वजनिक नैतिकता के दावे पर सवाल किया, तो वरिष्ठ भाजपा नेता ने पलटवार किया। एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस के मनीष तिवारी और वेणुगोपाल, और आरएसपी के एन के प्रेमचंद्रन सहित विपक्षी सांसदों ने प्रस्तावित कानून को संविधान और संघवाद के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध किया।




बहुत ही व्यावहारिक और निष्पक्ष कवरेज