नई दिल्ली: ग्रीनलैंड दुनिया की सबसे बड़ी बर्फ की चादर का घर है। यहां इतनी बर्फ जमी है कि अगर पूरी पिघल जाए तो विश्व का समुद्र स्तर 7 मीटर तक बढ़ सकता है। लेकिन अब यह बर्फ तेज गति से गायब हो रही है। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि पिघलने का बड़ा कारण समुद्र का गरम होना है। समुद्र का पानी गर्म होने से ग्लेशियरों के नीचे पहुंचता है और बर्फ को अंदर से पिघलाता है। इसे ‘बेसल मेल्टिंग’ कहते हैं। ऊपर से हवा गरम होने से सतह पर पिघलन होती है, लेकिन नीचे से समुद्र की गर्मी ज्यादा खतरनाक है। इससे बड़े-बड़े आइसबर्ग टूटकर समुद्र में गिरते हैं, जिसे ‘कैल्विंग’ कहते हैं।
बर्फ पिघलने की रफ्तार कई गुना बढ़ गई
पिछले कुछ दशकों में ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने की रफ्तार कई गुना बढ़ गई है। 2000 के बाद से हर साल औसतन 270 अरब टन बर्फ पिघल रही है। कुछ सालों में तो रिकॉर्ड टूटा, जैसे 2019 में एक साल में 500 अरब टन से ज्यादा बर्फ गायब हुई। सैटेलाइट तस्वीरें दिखाती हैं कि ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं और पिघलते पानी की नदियां बन रही हैं।
समुद्र की गर्मी का असर
जलवायु परिवर्तन से पूरी दुनिया के समुद्र गरम हो रहे हैं। ग्रीनलैंड के आसपास का अटलांटिक महासागर भी प्रभावित है। गर्म पानी धाराएं ग्लेशियरों के संपर्क में आती हैं और बर्फ को तेजी से पिघलाती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रक्रिया पहले अनुमान से ज्यादा तेज है।एक अध्ययन में पाया गया कि ग्रीनलैंड के कई बड़े ग्लेशियर, जैसे जैकोबशॉन ग्लेशियर, समुद्र की गर्मी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह ग्लेशियर पहले दुनिया का सबसे तेज बहने वाला ग्लेशियर था, जो अब और तेज पिघल रहा है।
दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने से समुद्र स्तर बढ़ रहा है। पिछले 20 सालों में इससे अकेले 1.5 सेंटीमीटर समुद्र स्तर बढ़ा है। अगर यही रफ्तार रही तो 2100 तक समुद्र 10-20 सेंटीमीटर और ऊपर चढ़ सकता है। इससे भारत जैसे देशों के तटीय शहर मुंबई, कोलकाता, चेन्नई बाढ़ के खतरे में आएंगे। छोटे द्वीप राष्ट्र तो डूबने की कगार पर हैं।यह सिर्फ समुद्र स्तर की बात नहीं। पिघलता पानी ठंडा होने से समुद्र की धाराएं बदल रही हैं, जो मौसम को प्रभावित करती हैं। यूरोप में सर्दियां बदल सकती हैं, मानसून पर असर पड़ सकता है। साथ ही, बर्फ के सफेद होने से सूरज की किरणें वापस अंतरिक्ष में जाती थीं, अब गहरा समुद्र ज्यादा गर्मी सोख रहा है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज करता है।आर्कटिक के जीव-जंतु भी संकट में हैं। पोलर बियर का घर छिन रहा है, मछलियां प्रभावित हो रही हैं।
क्या किया जा सकता है?
वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन कम करना जरूरी है। पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करें तो पिघलन की रफ्तार धीमी हो सकती है। लेकिन अभी उत्सर्जन बढ़ रहा है, इसलिए स्थिति चिंताजनक है।दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा, जंगलों की रक्षा और प्रदूषण कम करने के प्रयास तेज करने होंगे। व्यक्तिगत स्तर पर भी हम प्लास्टिक कम इस्तेमाल करें, ऊर्जा बचाएं। ग्रीनलैंड की बर्फ हमारी धरती की सेहत का आईना है, इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। यह संकट बताता है कि जलवायु परिवर्तन दूर की बात नहीं, बल्कि अभी की हकीकत है। अगर नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियां बड़ा खामियाजा भुगतेंगी।



