मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। करीब 20 साल बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे फिर से एक साथ आ गए हैं। दोनों ठाकरे भाइयों की पार्टियां आगामी बीएमसी चुनाव में गठबंधन के तहत चुनाव लड़ेंगी। इसके साथ ही जनवरी 2026 में होने वाले राज्य के 29 नगर निगम चुनावों के लिए भी दोनों दलों ने मिलकर मैदान में उतरने का ऐलान किया है। शिवाजी पार्क स्थित बालासाहेब ठाकरे के स्मारक पहुंचकर उन्होंने श्रद्धांजलि दी। इस दौरान आदित्य ठाकरे और अमित ठाकरे भी मौजूद रहे।
— ShivSena – शिवसेना Uddhav Balasaheb Thackeray (@ShivSenaUBT_) December 24, 2025
बैठकों के बाद बनी सहमति
गठबंधन की औपचारिक घोषणा से पहले शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत शिवतीर्थ पहुंचे, जहां उन्होंने राज ठाकरे से मुलाकात की। इसके बाद एमएनएस के नेताओं का प्रतिनिधिमंडल देर शाम मातोश्री पहुंचा और उद्धव ठाकरे से चर्चा की। हालांकि दोनों दलों के गठबंधन का ऐलान 23 दिसंबर को होना था, लेकिन आखिरी वक्त में सीटों को लेकर बने पेच के चलते इसे एक दिन के लिए टाल दिया गया। बताया गया है कि पिछली बीएमसी में शिवसेना को मिली 84 सीटों में से 12 से 15 सीटें एमएनएस को देने पर उद्धव गुट सहमत था, लेकिन कुछ कठिन सीटों को लेकर असमंजस बना हुआ था।
बीते महीनों में बढ़ी नजदीकियां
पिछले कुछ समय से उद्धव और राज ठाकरे के बीच राजनीतिक नजदीकियां बढ़ती देखी जा रही थीं। इसी साल जुलाई में मुंबई के वर्ली डोम में दोनों भाइयों ने एक साथ रैली की थी, जहां उन्होंने 20 साल बाद एक मंच साझा किया था। इससे पहले वर्ष 2006 में बालासाहेब ठाकरे की रैली में दोनों साथ नजर आए थे।
क्या होंगे सियासी मायने
मराठी वोटों का एकीकरण: अब तक शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के अलग-अलग चुनाव लड़ने से मराठी वोटों का बंटवारा होता था। दोनों दलों के साथ आने से मराठी मतों का एकीकरण संभव माना जा रहा है, जिसका सीधा असर भाजपा और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन पर पड़ सकता है।
BJP के लिए चुनौती: BJP ने मुंबई में शहरी, गुजराती और उत्तर भारतीय मतदाताओं में मजबूत पकड़ बनाई है। ऐसे में ठाकरे भाइयों की एकजुटता भाजपा के लिए खासकर मध्य मुंबई और मराठी बहुल इलाकों में सियासी चुनौती बन सकती है।
शिंदे गुट पर दबाव: मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट खुद को ‘असली शिवसेना’ बताता रहा है। ठाकरे ब्रदर्स की एकजुटता से शिंदे गुट की वैधता को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं और पार्टी कैडर में असमंजस की स्थिति बन सकती है।
बीएमसी पर नियंत्रण की लड़ाई: बीएमसी देश की सबसे समृद्ध नगर निगम मानी जाती है और लंबे समय तक इस पर शिवसेना का दबदबा रहा है। दोनों ठाकरे भाइयों के साथ आने से उद्धव ठाकरे की खोई हुई राजनीतिक जमीन को मजबूती मिलने की संभावना जताई जा रही है।



