बिहार चुनाव का ‘डी’ फैक्टर, कौन आगे कौन पीछे?

बिहार में बीते विधानसभा चुनाव के परिणाम से सभी दलों ने सबक सीखा है। तब सत्तारूढ़ राजग बमुश्किल हांफते-कांपते बहुमत के आंकड़े तक पहुंचा तो विपक्षी महागठबंधन पूरी ताकत लगाने के बावजूद बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर रह गई। अब दोनों ही पक्षों के लिए सत्ता बचाने या पाने की जंग में अपने-अपने मूल वोट बैंक को बचाने के साथ नया वोट बैंक तैयार करना चुनौती है। इस लिहाज से इस बार के चुनाव में दोनों गठबंधन दलित वोट बैंक को साधने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं।

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नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव का पिछला मुकाबला सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी महागठबंधन के बीच करीब-करीब बराबरी पर छूटा था। लोजपा की भाजपा के साथ और जदयू के खिलाफ की रणनीति के कारण राज्य के करीब 20 फीसदी मतदाताओं में उपजे ऊहापोह से हासिल ऊर्जा ने विपक्षी गठबंधन को करीब-करीब बहुमत के जादुई आंकड़े तक पहुंचा दिया था। पिछली बार दलित वोट बैंक के मामले में दोनों गठबंधनों के बीच मुकाबला करीब-करीब बराबरी पर छूटा था। अब इस चुनाव में सत्ता बचाने और सत्ता पाने की जंग के बीच दोनों गठबंधनों की नजर इसी दलित वोट बैंक पर है।
जहां तक राज्य में दलित मतदाताओं के प्रभाव का सवाल है तो यह व्यापक है। राज्य की 38 सीटें एससी सुरक्षित हैं। इसके अलावा करीब 60 सीटें ऐसी हैं जहां इस वर्ग के मतदाता चुनावी परिणाम को सीधे तौर पर प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। बीते चुनाव में इन 38 सीटों में से 21 सत्तारूढ़ राजग और 17 सीटें राजग के हाथ लगी थी। कभी महादलित कार्ड से इस बिरादरी में व्यापक असर बनाने वाले जदयू को महज 8 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। चिराग की इस नई रणनीति ने जदयू को महज 43 सीटों पर सीमित कर दिया था।

चिराग से गड़बड़ा दिए थे जदयू के समीकरण
बीते चुनाव में यदि विपक्षी महागठबंधन ने सत्तारूढ़ गठबंधन को कड़ी चुनौती दी थी, या उन्हें करीब-करीब सत्ता से बेदखल कर दिया था तो इसके जिम्मेदार चिराग पासवान थे। उस चुनाव में चिराग ने चुन चुन कर जदयू उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे थे। चिराग की इस रणनीति के कारण जदयू को सीधे 28 सीटों का नुकसान हुआ। राजग के वोट बैंक में बंटवारे के कारण विपक्षी महागठबंधन की सीटों की संख्या 110 पहुंच गई।

आंकड़ों से समझें गणित
बीते चुनाव में राजग को 37.26 फीसदी और विपक्षी महागठबंधन को 37.23 फीसदी वोट मिले। जदयू के सीटों की संख्या 71 से घट कर 43 रह गई। चिराग की पार्टी को एक सीट और 5.31 फीसदी वोट मिले। अगर उक्त चुनाव में चिराग राजग के साथ रहते तो इस गठबंधन का वोट करीब 43 फीसदी होता। यह विपक्षी गठबंधन से करीब छह फीसदी ज्यादा होता।

अब क्या है राजग की चुनौती?
लोजपा(आर) फिलहाल राजग के साथ है। हालांकि इसके मुखिया चिराग पासवान के बागी तेवर में कोई कमी नहीं आई है। उन्होंने खुद चुनाव लडऩे के साथ ही इस बार सभी 243 सीटों पर चुनाव लडऩे की घोषणा की है। करीब 20 फीसदी दलित वर्ग के वोट में चिराग के स्वजातीय दुसाध बिरादरी की हिस्सेदारी करीब 27 फीसदी है। ऐसे में अगर राजग चिराग को मनाने में असफल रही तो इसका लाभ सीधे-सीधे विपक्षी महागठबंधन को मिलेगा। चिराग के साथ राजग में शामिल हम के मुखिया जीतनराम मांझी अधिक सीटों पर चुनाव लडऩ चाहते हैं। मांझी जिस मुसहर बिरादरी से आते हैं उसकी दलित वर्ग में हिस्सेदारी करीब दो फीसदी है। जाहिर तौर पर अगर भाजपा-जदयू इन दोनों को साधने में असफल रहे तो सत्तारूढ़ राजग की मुश्किलें बढ़ेंगी।

महागठबंधन की भी कम नहीं है चुनौती
विपक्षी महागठबंधन की अगुवाई करने वाले राजद के पास इस वोट बैंक को साधने का अपना कोई नजरिया नहीं है। राजद इस मामले में पूरी तरह से कांग्रेस पर निर्भर है। कांग्रेस ने जरूर अगड़ा वर्ग के अखिलेश सिंह की जगह दलित बिरादरी के राजेश राम को अध्यक्ष बना कर संदेश दिया है। चुनाव से पहले राहुल गांधी दलितों छात्रों के साथ संवाद कर चुके हैं। हालांकि इस गठबंधन में शामिल राजद समेत अन्य दलों ने इस वोट बैंक के लिए कोई विशेष रणनीति नहीं बनाई है। हां, इन्हें लगता है कि लोजपा के दूसरे धड़े के नेता पशुपति पारस को साधने से उसे कुछ लाभ होगा।

जदयू-भाजपा की चुनौतियां
सीएम नीतीश कुमार ने कभी महादलित कार्ड खेल कर गैर पासवान वोट बैंक में गहरी पैठ बनाई थी। हालांकि अब स्थिति दूसरी है। पार्टी के पास इस वोट बैंक को साधने के लिए कोई चेहरा नहीं है। भाजपा-जदयू ने भीम संवाद और जय भीम यात्रा के जरिए इस वोट बैंक को साधे रखने की कोशिश की है। हालांकि राजद की तरह इनके पास भी इस वर्ग का कोई बड़ा चेहरा नहीं है। दोनों दल इस मामले में चिराग और मांझी पर ही निर्भर हैं।

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