नयी दिल्ली। देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला ‘अरावली’ के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरों के बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और साहसिक फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जेके माहेश्वरी और जस्टिस एजी मसीह की विशेष पीठ ने अपने ही उस पुराने फैसले पर रोक लगा दी है, जिसने अरावली के वजूद को महज ‘100 मीटर की ऊंचाई’ तक सीमित कर दिया था। कोर्ट का यह कदम उन हजारों पर्यावरण प्रेमियों की जीत है जो हफ्तों से दिल्ली से लेकर जयपुर की सड़कों पर उतरे हुए थे।
क्या था विवाद? जिसने सुलगा दी थी विरोध की आग
विवाद की जड़ में 20 नवंबर 2024 का वह आदेश था, जिसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की पीठ ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की उस सिफारिश को हरी झंडी दे दी थी, जिसमें कहा गया था कि केवल उन्हीं पहाड़ियों को ‘अरावली’ माना जाए जो जमीन से 100 मीटर से ज्यादा ऊंची हैं।
इस परिभाषा का सीधा मतलब यह था कि अरावली के करीब 40 प्रतिशत छोटे टीले और कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जातीं। पर्यावरणविदों का आरोप था कि यह परिभाषा सीधे तौर पर खनन माफिया और बड़े बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए गढ़ी गई थी। जैसे ही यह आदेश आया, हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम और राजस्थान के अलवर व झुंझुनूं में हड़कंप मच गया।
सड़कों पर उतरा जनसैलाब: गुरुग्राम से दिल्ली तक गूंजा ‘अरावली बचाओ’
सोमवार को जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पुराने आदेश पर रोक लगाई, तो यह उन हजारों कंठों की जीत थी जो पिछले कई दिनों से कड़कड़ाती ठंड में सड़कों पर ‘अरावली बचाओ’ के नारे लगा रहे थे। दिल्ली से लेकर राजस्थान के रेगिस्तानी जिलों तक, विरोध प्रदर्शनों ने सरकार और खनन माफिया के गठजोड़ की नींव हिला दी है।
गुरुग्राम से दिल्ली तक ‘पैदल मार्च’: जब थम गए हाईवे के पहिए
आंदोलन की सबसे बड़ी तस्वीर रविवार को देखने को मिली, जब गुरुग्राम के लेपर्ड ट्रेल और अरावली बायो-डायवर्सिटी पार्क से हजारों की संख्या में लोग पैदल ही दिल्ली की ओर कूच कर गए।
विशाल पदयात्रा इसमें केवल पर्यावरणविद ही नहीं, बल्कि स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और पूर्व सैन्य अधिकारी भी शामिल थे। प्रदर्शनकारियों के हाथों में ‘अरावली हमारा फेफड़ा है, इसे मत काटो’ जैसे बैनर थे।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जंतर-मंतर पर जुटे प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार और पर्यावरण मंत्रालय के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि 100 मीटर की नई परिभाषा केवल बड़े बिल्डरों और अवैध खनन करने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए लाई गई थी।
हरियाणा-राजस्थान के गांवों में ‘महापंचायत’ का बिगुल, विरोध की आग केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि ग्रामीण अंचलों में भी फैल गई:
सरिस्का और अलवर राजस्थान के अलवर में ग्रामीणों ने बड़ी ‘महापंचायत’ की। ग्रामीणों का कहना है कि अरावली की छोटी पहाड़ियां उनके पशुओं के चरने और जल संरक्षण का मुख्य स्रोत हैं। यदि इन्हें खनन के लिए खोला गया, तो पूरे इलाके का पारिस्थितिकी तंत्र तबाह हो जाएगा।
फरीदाबाद और मेवात हरियाणा के मांगर और धौज इलाकों में महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर ‘चिपको आंदोलन’ की याद दिला दी। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि एक भी पत्थर अवैध रूप से उठाया गया, तो वे अपनी जान की बाजी लगा देंगे।
सोशल मीडिया पर आक्रोश
‘सेव अरावली’ हैशटैग हफ्तों तक ट्रेंड करता रहा, जिसमें दावा किया गया कि 100 मीटर की सीमा तय करना अरावली के ‘डेथ वारंट’ पर हस्ताक्षर करने जैसा है।
विशेषज्ञों की समिति करेगी तय
अदालत ने अब माना है कि अरावली जैसी दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला को बचाने के लिए इसकी व्यापक परिभाषा जरूरी है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली इन पहाड़ियों में अब तब तक नए खनन पट्टेजारी नहीं किए जा सकेंगे, जब तक विशेषज्ञ अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देते।
क्यों जरूरी है अरावली का बचाव?
रेगिस्तान पर रोक: अरावली की पहाड़ियां थार रेगिस्तान को बढ़ने से रोकने के लिए एक प्राकृतिक दीवार का काम करती हैं।
जल स्तर: ये पहाड़ियां भूजल रिचार्ज और जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
प्रदूषण से सुरक्षा: दिल्ली-एनसीआर के लिए अरावली एक ‘फेफड़े’ की तरह काम करती है, जो धूल और प्रदूषण को रोकती है।
कोर्ट की टिप्पणी: सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा था कि अरावली में अनियंत्रित खनन पूरे देश की पारिस्थितिकी के लिए एक बड़ा खतरा है।



