नई दिल्ली: कल्पना कीजिए, एक साधारण चिप्स का पैकेट जो न सिर्फ आपकी भूख मिटाता है, बल्कि आपको बार-बार लौटने पर मजबूर कर देता है। अमेरिकी ब्रांड लेय्स की वो मशहूर चुनौती एक चिप्स खाओ, फिर रुकना मुश्किल। आज हकीकत बन चुकी है। ये सिर्फ मार्केटिंग का जुमला नहीं, बल्कि पैकेज्ड फूड की दुनिया में बुनी गई एक चालाकी भरी साजिश है। ब्रिटेन की मार्केट रिसर्च कंपनी टेकनैवियो की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2024 से 2029 तक ग्लोबल अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) मार्केट 856 अरब डॉलर का आंकड़ा छू लेगा। यूरोप इसकी 45% ग्रोथ का इंजन बनेगा, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा, चीन, फ्रांस, इटली, स्पेन, जापान और नीदरलैंड्स जैसे देशों में भी ये ‘स्वाद का तूफान’ तेज हो रहा है। भारत जैसे उभरते बाजारों में ये ट्रेंड चुपके से घुसपैठ कर रहा है, जहां सस्ते स्नैक्स और रेडी-टू-ईट आइटम्स अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन सवाल ये है: क्या ये ‘सुविधाजनक भोजन’ वाकई इतना मासूम है? विशेषज्ञों का मानना है कि जंक फूड की ये लत शराब या तंबाकू से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है, क्योंकि ये हर कोने में उपलब्ध है और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सबको ललचाती है।
अमेरिका से सबक: आधी से ज्यादा कैलोरी UPF से
अमेरिका में हाल ही में ‘जर्नल ऑफ ओबेसिटी एंड मेटाबॉलिक सिंड्रोम’ में छपी स्टडी चौंकाने वाली है। वहां UPF कुल कैलोरी इनटेक का 57.5% हिस्सा बन चुका है। ब्रिटेन में ये आंकड़ा 56.8%, कनाडा में 46.8% और ऑस्ट्रेलिया में 42% है। भारत और अन्य विकासशील देशों में भी ये संख्या तेजी से चढ़ रही है। नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के ग्लोबल फूड रिसर्च प्रोग्राम की 2023 की रिपोर्ट कहती है कि UPF की सफलता का राज है इसका ‘हाइपर-पैलेटेबल’ फॉर्मूला चीनी, नमक, फैट और कार्ब्स का ऐसा मिश्रण जो दिमाग को ‘हिट’ देता है। ये फॉर्मूला कोई नई खोज नहीं। इसकी जड़ें तंबाकू इंडस्ट्री में हैं। प्रोफेसर एश्ले गेयरहार्ट, जो मोटापा और डायबिटीज पर रिसर्च करती हैं, बताती हैं कि सिगरेट को लत लगाने वाले 4,000 से ज्यादा केमिकल्स – जैसे कोको, शुगर और मेंथॉल – अब फूड प्रोडक्ट्स में घुस चुके हैं। 1960 के दशक में फिलिप मॉरिस और आरजे रेनॉल्ड्स जैसी तंबाकू दिग्गजों ने सॉफ्ट ड्रिंक्स और स्नैक्स ब्रांड्स खरीदना शुरू किया। हवाई पंच, कूल-एड, टैंग जैसे बच्चों के ड्रिंक्स से लेकर क्राफ्ट, जनरल फूड्स और 7अप तक – ये कंपनियां UPF की दुनिया की मालिक बन गईं।
ITC जैसी कंपनियां इसका जीता-जागता उदाहरण
भारत में ITC जैसी कंपनियां इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। तंबाकू से फूड बिजनेस में शिफ्ट करते हुए इन्होंने ‘क्रेविंग कोड’ डिकोड किया। यानी ऐसे फूड्स डिजाइन किए जो बार-बार खाने की तलब जगाएं। 1990 के दशक में अमेरिकी साइको-फिजिसिस्ट हॉवर्ड मॉस्कोविट्ज ने ‘ब्लिस पॉइंट’ कॉन्सेप्ट दिया: वो परफेक्ट स्वीट-सॉल्टी बैलेंस जहां टेस्ट बड्स सबसे ज्यादा खुश होते हैं। डॉ. पेपर सोडा और प्रेगो सॉस जैसे हिट प्रोडक्ट्स इसी से पैदा हुए, जो आज भारत के शेल्फ्स पर भी छाए हैं। मॉस्कोविट्ज कहते हैं, टेस्ट ट्रायल्स से पता चलता है कि हर ग्रुप का ब्लिस पॉइंट अलग होता है। इससे कंपनियां वेरिएंट्स बनाकर सबको फंसाती हैं। पुलित्जर विजेता जर्नलिस्ट माइकल मॉस, जिन्होंने UPF इंडस्ट्री की परतें खोली हैं, इसे ‘अनकंट्रोलेबल क्रेविंग’ का खेल बताते हैं। चीनी हो या नमक, तला-भुना हो या आर्टिफिशियल फ्लेवर्स सब मिलाकर कंपनियां ये सुनिश्चित करती हैं कि एक बाइट से रुकना नामुमकिन हो जाए। वो बताते हैं कि फ्लेवर लैब्स में केमिस्ट्स असली फूड जैसा टेस्ट क्रिएट करते हैं, सस्ते इंग्रीडिएंट्स से। क्राफ्ट हेंज का ‘लंचेबल्स’ प्री-पैक्ड मीट ट्रे इसका परफेक्ट एग्जांपल है। पिज्जा, टैको वर्जन तक पहुंच गया ये, लेकिन मॉस कहते हैं, ये फूड नहीं, लत का पैकेज है,. तंबाकू या अल्कोहल से बदतर, क्योंकि ये हर सुपरमार्केट में ‘हेल्दी ऑप्शन’ बनकर बिकता है।
भारत में जंक फूड का धीमा जहर
भारत में UPF का बाजार 2006 के 90 करोड़ डॉलर से 2019 तक 37.9 अरब डॉलर हो गया, सालाना 33% ग्रोथ। WHO और ICRIER की 2023 स्टडी कहती है कि 2011-21 में रिटेल सेल्स वॉल्यूम 15.8% चढ़ा। हाउसहोल्ड कंजम्प्शन सर्वे 2022-23 के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में 9.6% और शहरी में 10.64% फूड बजट UPF पर खर्च होता है। चॉकलेट, शुगर कन्फेक्शनरी टॉप पर है, उसके बाद रेडी-टू-ईट, नमकीन स्नैक्स, ड्रिंक्स और ब्रेकफास्ट सीरियल्स। 2021 में स्वीट बिस्किट्स ने 43% मार्केट कैप्चर किया। सस्ते, लंबे शेल्फ लाइफ वाले, लेकिन हेल्थ रिस्क से भरे। ये ग्रोथ मोटापे की महामारी से जुड़ी है।NFHS डेटा दिखाता है कि 2005-06 से 2019-20 तक ओवरवेट/ओबेसिटी रेट 10% से ज्यादा बढ़ा। शहरी पुरुषों में 29.8%, महिलाओं में 33.2%; ग्रामीण में 19.3% और 19.7%। बच्चों में 2005-06 से 2015-16 तक 19.3% जंप। इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 कहता है, जंक फूड मोटापे का मेन कसूरवार है। केलॉग्स जैसे सीरियल्स को ‘हेल्दी ब्रेकफास्ट’ बेचकर कंपनियां ब्राजील, यूरोप और भारत को टारगेट कर रही हैं।
नीतियों का जाल: टैक्स से लेबलिंग तक
वैज्ञानिक सलाह देते हैं: ताजा फल चुनें, स्कूल-ऑफिस में ‘नो जंक जोन’ बनाएं। 45+ देशों ने शुगर-स्वीटेंड ड्रिंक्स पर टैक्स लगाया – UK, मैक्सिको, साउथ अफ्रीका। चिली, इजरायल जैसे देशों ने फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल्स (FOPL) अपनाए, बच्चों के ऐड्स बैन किए। भारत में 2016 में केरल ने बर्गर-पिज्जा पर ‘फैट टैक्स’ लगाया। NAPi (न्यूट्रिशन एडवोकसी इन पब्लिक इंटरेस्ट) के अरुण गुप्ता कहते हैं, “फूड लॉबीज नीतियों को मोड़ती हैं। फंडिंग, बायस्ड रिसर्च से।” 2018 में FOPL प्लान रुक गया, हेल्थ स्टार रेटिंग आया – जो अब सुप्रीम कोर्ट में है। इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 ने ‘हेल्थ टैक्स’ सुझाया, लेकिन कॉरपोरेट टाई-अप्स (जैसे कोका-कोला के साथ मिनिस्ट्री का वर्ल्ड फूड इंडिया 2025) विरोधाभास दिखाते हैं। NAPi रिपोर्ट: 2014 में नेस्ले-कोका ने स्कूल जंक फूड गाइडलाइंस कमिटी में दखल दिया, परिभाषा चैलेंज की। ये हितों का क्लैश है।



