डिजिटल युग की चुनौतियों से निपटने और शासन को बेहतर बनाने के लिए भारत और दक्षिण कोरिया के बीच दिल्ली में द्विपक्षीय वार्ता का आयोजन, साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने पर ज़ोर।
नई दिल्ली: भारत की राजधानी नई दिल्ली एक बार फिर वैश्विक कूटनीति और रणनीतिक साझेदारी का केंद्र बनी है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या पर, भारत और दक्षिण कोरिया गणराज्य के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय द्विपक्षीय बैठक संपन्न हुई। भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेन्द्र सिंह और दक्षिण कोरिया के गृह एवं सुरक्षा मंत्री युन होजुंग के बीच हुई इस मुलाकात ने दोनों देशों के ‘विशेष रणनीतिक संबंधों’ को एक नया आयाम दिया है।
इस बैठक का मुख्य एजेंडा पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़कर 21वीं सदी की सबसे बड़ी जरूरत यानी डिजिटल गवर्नेंस (ई-शासन), लोक प्रशासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग, क्षमता निर्माण और नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण पर केंद्रित था। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच एक घंटे से अधिक समय तक चली इस गहन वार्ता में न केवल आधुनिक तकनीकों के आदान-प्रदान पर सहमति बनी, बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को भी याद किया गया।
साझा लोकतांत्रिक मूल्य और रणनीतिक दृष्टिकोण
बैठक की शुरुआत करते हुए केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कोरियाई प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध केवल व्यापारिक या कूटनीतिक नहीं हैं, बल्कि यह दो जीवंत लोकतंत्रों का मिलन है। दोनों देश कानून के शासन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नवाचार (इन्नोवेशन) के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध हैं।
डॉ. सिंह ने इस वर्ष अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग की भारत यात्रा का उल्लेख किया। उस यात्रा के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ली जे म्युंग के बीच हुई मुलाकात ने दोनों देशों के संबंधों को एक नई दिशा दी थी। उस समय जारी किए गए ‘संयुक्त रणनीतिक दृष्टिकोण वक्तव्य’ (Joint Strategic Vision Statement) का जिक्र करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि वह दस्तावेज़ दोनों देशों के भविष्य की द्विपक्षीय साझेदारी के लिए एक महत्वाकांक्षी मार्गदर्शक है। व्यापार, निवेश, बंदरगाह, समुद्री मामले, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, संस्कृति और फिनटेक जैसे क्षेत्रों में जो सकारात्मक प्रगति हो रही है, वह इसी विज़न का परिणाम है।
भारत की डिजिटल क्रांति और शासन में सुधार
चर्चा के दौरान डॉ. जितेन्द्र सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में आए प्रशासनिक और डिजिटल बदलावों का एक व्यापक खाका प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कैसे भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल लोकतंत्र बनकर उभरा है।
भारत ने नागरिक सेवाओं को पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए कई तकनीकी प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं:
- सीपीजीआरएएमएस (CPGRAMS): केंद्रीयकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के माध्यम से आम नागरिकों की समस्याओं का समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से समाधान किया जा रहा है।
- डिजिटल जीवन प्रमाण पत्र (Jeevan Pramaan): इस तकनीक ने देश के लाखों बुजुर्ग पेंशनभोगियों के जीवन को आसान बना दिया है, जिन्हें अब अपना अस्तित्व साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ते।
- प्रौद्योगिकी-आधारित शासन: भारत ने ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ (Minimum Government, Maximum Governance) के सिद्धांत को अपनाते हुए बिचौलियों को खत्म किया है और सीधे लाभार्थियों तक लाभ पहुँचाया है।
दक्षिण कोरिया का ‘स्मार्ट गवर्नेंस’ अनुभव
दूसरी तरफ, दक्षिण कोरिया के गृह एवं सुरक्षा मंत्री युन होजुंग ने भी अपने देश की तकनीकी प्रगति और बेहतरीन प्रशासनिक तौर-तरीकों को साझा किया। दक्षिण कोरिया को दुनिया में अपनी तेज़ इंटरनेट कनेक्टिविटी और उन्नत डिजिटल बुनियादी ढांचे के लिए जाना जाता है।
कोरियाई पक्ष ने निम्नलिखित क्षेत्रों में अपने अनुभव साझा किए:
- स्मार्ट शासन (Smart Governance): कैसे डेटा और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का उपयोग करके शहरी और ग्रामीण प्रशासन को बेहतर बनाया जा रहा है।
- आपदा एवं सुरक्षा प्रबंधन: प्राकृतिक आपदाओं और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए दक्षिण कोरिया द्वारा विकसित की गई अत्याधुनिक प्रणालियाँ, जो त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करती हैं।
- डिजिटल सार्वजनिक सेवाएँ: नागरिकों को बिना किसी बाधा के सरकारी सेवाएँ उपलब्ध कराने के डिजिटल मॉडल।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सेतु: अयोध्या से सियोल तक
इस द्विपक्षीय वार्ता का एक सबसे खूबसूरत और भावुक पहलू वह रहा जब डॉ. जितेन्द्र सिंह ने दोनों देशों के बीच के प्राचीन ऐतिहासिक संबंधों का जिक्र किया। उन्होंने अयोध्या की राजकुमारी सुरिरत्ना (जिन्हें कोरिया में रानी हियो ह्वांग-ओक के नाम से जाना जाता है) और दक्षिण कोरिया के राजा किम सूरो के बीच हुए विवाह के ऐतिहासिक बंधन को याद किया।
“हम दो ऐसी प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाएं हैं जिनका संबंध ऐतिहासिक भी है और भविष्योन्मुखी भी। अयोध्या की राजकुमारी और कोरियाई राजा का वह वैवाहिक संबंध आज भी हमारे दिलों में एक गहरा महत्व रखता है और यह हमारे सांस्कृतिक संबंधों की सबसे मजबूत नींव है।” – डॉ. जितेन्द्र सिंह
अतिथि मंत्री युन होजुंग, जो कोरिया-भारत संसदीय मैत्री समूह के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, के योगदान की सराहना करते हुए डॉ. सिंह ने उम्मीद जताई कि यह यात्रा दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संपर्क (People-to-People Contact) को और अधिक मजबूत करेगी।
उभरती चुनौतियाँ और एमओयू (MoU) पर चर्चा
बदलते वैश्विक परिदृश्य में लोक प्रशासन के सामने कई नई चुनौतियाँ आ रही हैं। इनसे निपटने के लिए दोनों देशों के मंत्रालय सक्रिय रूप से एक समझौता ज्ञापन (MoU) को अंतिम रूप देने के लिए चर्चा कर रहे हैं। यह एमओयू लोक प्रशासन और सरकारी नवाचार (Government Innovation) के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देगा।
भविष्य के सहयोग के मुख्य बिंदु:
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का अनुप्रयोग: प्रशासनिक कार्यों में एआई का जिम्मेदारी से उपयोग करना ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज़ और निष्पक्ष हो सके।
- सिविल सेवकों का क्षमता निर्माण: दोनों देशों के अधिकारियों के लिए संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना ताकि वे आधुनिक तकनीकों से लैस हो सकें।
- नागरिक भागीदारी: शासन व्यवस्था में आम जनता की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए नए डिजिटल टूल्स का विकास करना।
योग और वैश्विक कल्याण
चर्चा के अंत में, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या का उल्लेख करते हुए डॉ. जितेन्द्र सिंह ने प्रसन्नता व्यक्त की कि दक्षिण कोरिया में योग की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। उन्होंने दक्षिण कोरियाई प्रतिनिधिमंडल को योग समारोहों में भाग लेने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया, जो शारीरिक और मानसिक कल्याण के साथ-साथ वसुधैव कुटुंबकम के भारतीय विचार को भी प्रदर्शित करता है।
यह बैठक बेहद सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण माहौल में समाप्त हुई। दोनों नेताओं ने इस बात की पुष्टि की कि आने वाले समय में भारत और दक्षिण कोरिया मिलकर एक ऐसे प्रशासनिक ढांचे का निर्माण करेंगे जो अधिक कुशल, पारदर्शी और पूरी तरह से नागरिक-केंद्रित हो। यह रणनीतिक साझेदारी न केवल इन दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता और प्रगति के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।



