नई दिल्ली: देशभर के सरकारी और निजी स्कूलों में बच्चों की सेहत को खतरे की घंटी बजा रही एस्बेस्टस युक्त टीन की छतों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायिक सदस्य अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की बेंच ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए सभी स्कूलों को एक वर्ष के भीतर इन जहरीली शीटों को पूरी तरह हटाने या सुरक्षित विकल्पों से बदलने का निर्देश दिया। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और वायु प्रदूषण निवारण अधिनियम 1981 के तहत लिया गया है, जिसमें सावधानी के सिद्धांत को प्राथमिकता दी गई।
एनजीटी ने स्पष्ट किया कि यदि छत की शीटें अच्छी हालत में हैं, तो उन्हें तत्काल हटाने की आवश्यकता नहीं, लेकिन उन पर सुरक्षात्मक पेंट या कोटिंग लगाई जानी अनिवार्य होगी। वहीं, क्षतिग्रस्त शीटों को तुरंत हटाने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए। इन्हें गीला करके विशेषज्ञों की देखरेख में निकाला जाए ताकि हानिकारक रेशे हवा में न फैलें। अदालत ने जोर दिया कि ऐसी मरम्मत, स्थापना या हटाने का कार्य केवल प्रमाणित पेशेवरों से ही कराया जाए। साथ ही, स्कूल कर्मचारियों को एस्बेस्टस के जोखिमों और सुरक्षा उपायों पर प्रशिक्षण प्रदान किया जाए। ट्रिब्यूनल ने इसकी निगरानी का दायित्व खुद संभाला है, जबकि अमीकस क्यूरी प्रगति की समीक्षा करेंगे।
एस्बेस्टस कचरे का सुरक्षित निपटान अनिवार्य
NGT ने एस्बेस्टस को ‘खतरनाक रसायन’ करार देते हुए इसके कचरे के निपटान पर सख्त दिशानिर्देश जारी किए। कचरे को सीलबंद कंटेनरों या विशेष बैगों में पैक किया जाए, और परिवहन के दौरान वाहनों को ढककर चलाया जाए। वाहनों पर ‘एस्बेस्टस कचरा’ का स्पष्ट चिह्न अनिवार्य होगा। निपटान केवल लाइसेंस प्राप्त खतरनाक अपशिष्ट स्थलों पर ही हो सकेगा। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को नियमित निरीक्षण और पूर्ण रिकॉर्ड रखने का आदेश दिया गया है। एनजीटी ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय तथा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को छह माह में एस्बेस्टस से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाणों और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं की समीक्षा करने को कहा। इसके साथ ही, स्कूलों, घरों और अन्य भवनों में इसके उपयोग को सीमित या प्रतिबंधित करने की नीति तैयार करने तथा सुरक्षित संचालन, रखरखाव व निपटान के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करने का निर्देश दिया। अदालत ने नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट के 2011 के प्रतिबंध के बावजूद यह सामग्री स्कूलों में प्रचलित है, और अधिकांश राज्यों ने सर्वे या हटाने की योजना तक नहीं बनाई।
जिम्मेदारियां सौंपीं, उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई
फैसले में विभिन्न विभागों को स्पष्ट जिम्मेदारियां सौंपी गईं। शिक्षा मंत्रालय को राज्यों को दिशानिर्देश जारी करने, फंडिंग का प्रबंधन करने और हर तीन माह में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का काम सौंपा गया। पर्यावरण मंत्रालय नए नियम बनाएगा, जबकि सीपीसीबी गाइडलाइंस तैयार करेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय को एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारियों की जांच और जागरूकता अभियान चलाने को कहा गया। राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर सर्वे, हटाने और दंडात्मक कार्रवाई का दायित्व दिया गया, साथ ही एक माह में एक्शन प्लान बनाने का आदेश।
स्कूल प्रबंधनों को चेतावनी दी गई कि स्वयं ऑडिट न करने पर स्कूल बंदी और जुर्माने की कार्रवाई हो सकती है। मंत्रालयों और सीपीसीबी को छह माह बाद एक माह के अंदर रिपोर्ट सौंपनी होगी, अन्यथा महापंजीयक मामले को पुनः बेंच के समक्ष रखेंगे।
श्रमिक सुरक्षा को प्राथमिकता
एनजीटी ने एस्बेस्टस वाले स्थानों पर श्रमिकों की सुरक्षा पर विशेष बल दिया:
- कार्यस्थलों पर वायु में एस्बेस्टस स्तर की नियमित निगरानी।
- खतरे के संकेतक बोर्ड और चेतावनियां।
- सुरक्षात्मक उपकरण (पीपीई) जैसे मास्क और कपड़ों का अनिवार्य उपयोग।
- स्वास्थ्य जांच और प्रशिक्षण को बाध्यकारी बनाना।
- संपर्क क्षेत्रों में धूम्रपान, भोजन या पेय प्रतिबंधित।
याचिका का बैकग्राउंड
यह मामला दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के एक अतिथि शिक्षक की याचिका से उपजा, जिसमें देशभर के स्कूलों में एस्बेस्टस सीमेंट छतों पर रोक लगाने की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने बताया कि क्षतिग्रस्त छतें सूक्ष्म रेशे हवा में फैलाती हैं, जो बच्चों के फेफड़ों में कैंसर जैसी घातक बीमारियां पैदा कर सकती हैं। उन्होंने 2022 के ‘नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ अध्ययन और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की चेतावनी का हवाला दिया, जिसमें सभी प्रकार के एस्बेस्टस को फेफड़े, स्वरयंत्र और अंडाशय कैंसर का कारक बताया गया। याचिका में चरणबद्ध हटाने का सरकारी आदेश मांगा गया था।
यह फैसला न केवल स्कूलों बल्कि पूरे पर्यावरण संरक्षण के लिए मील का पत्थर साबित होगा, जो बच्चों की सांसों को जहरीले खतरे से मुक्त करेगा।



