हीट स्ट्रोक का सबसे ज्यादा शिकार कौन, इसका जवाब नहीं

केंद्र सरकार के कोई ऐसा प्रामाणिक डाटा नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि हीट स्ट्रोक से हर साल कितने लोगों की देश में मौत हो जाती है। इस पर कोई शोध भी नहीं है।

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नई दिल्ली: हीट स्ट्रोक के हर साल हजारों लोगों की मौत हो जाती है, फिर भी भारत के पास यह आंकड़ा नहीं है कि इससे सबसे ज्यादा किस वर्ग के लोग प्रभावित हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस पर कोई शोध भी नहीं हैं जबकि दुनियां के अन्य हिस्सों में ऐसे आंकड़े मौजूद हैं। उनके मुताबिक, गरीब, हाशिए पर रहने वाले लोग, प्रवासी, मजदूर, महिलाएं और बुज़ुर्ग हीट का शिकार हो रहे हैं। यह जानकारी केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में दी। 

उन्होंने कहा कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने देश भर में भीषण गर्मी के लिए तैयार किया गया जलवायु संकट और संवेदनशीलता एटलस प्रकाशित किया है। यह भीषण गर्मी से होने वाली मौतों पर आधारित है। यह मुख्य रूप से आपदा प्रबंधन क्षेत्रों के उपयोगकर्ताओं के लिए है ताकि वे गर्मी से प्रभावित संवेदनशील जिलों की पहचान कर सकें और निवारक और अनुकूली उपाय कर सकें। ये संवेदनशीलता मानचित्र और संवेदनशीलता आकलन जिला स्तर पर हैं।

2022 में हीट स्ट्रोक से गईं 730 जानें

एनसीआरबी के 2018-22 के आंकड़े बताते हैं कि पांच सालों में हीट स्ट्रोक से सबसे ज्यादा 1274 मौतें 2019 में हुईं। 2018 में 890 लोगों की जान गई। हालांकि 2021 में सबसे कम 374 लोग हीट स्ट्रोक के शिकार हुए। 2022 में 730 लोगों की मौत हुई। वहीं 2020 में 530 लोगों की जान गई।

मंत्री ने कहा कि असामान्य तापमान मानव शरीर पर गंभीर शारीरिक तनाव डाल सकती हैं, क्योंकि शरीर सामान्य तापमान सीमा में ही सबसे बेहतर ढंग से कार्य करता है। बुजुर्गों को अन्य लोगों की तुलना में अधिक जोखिम होता है। अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने से होने वाले चार सामान्य स्वास्थ्य प्रभावों में निर्जलीकरण, ऐंठन, थकावट और हीटस्ट्रोक शामिल हैं। अत्यधिक तापमान वृद्धि से जुड़ी चिंता, घबराहट, घबराहट और व्यवहार परिवर्तन के मामलों में भी वृद्धि हुई है। अधिकांश पीड़ितों का व्यावसायिक प्रोफाइल कृषि मजदूर, तटीय समुदाय के निवासी और गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे जीवन यापन करने वाले लोग थे, जिनका अधिकांश व्यवसाय बाहरी था।

बरते जाते हैं एहतियात

लोगों को हीटवेव से बचाने के लिए मौसमी और मासिक पूर्वानुमान जारी किए जाते हैं, जिसके बाद तापमान और लू की स्थिति का विस्तृत पूर्वानुमान जारी किया जाता है। समय पर जनता तक पहुंचने के लिए प्रारंभिक चेतावनी और पूर्वानुमान की जानकारी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के माध्यम से भी प्रसारित की जाती है। 

2023 तक दोगुनी हो जाएगी हीटवेव और बारिश!

पिछले कुछ साल से अप्रैल-मई में लू के थपेड़े जिस हिसाब से झूलसा रहे हैं और बारिश से जनजीवन हाल बेहाल हो रहा है उससे क्या आपके जेहन में भी सवाल उठ रहा है कि अब कितनी गर्मी पड़ेगी या बारिश होगी? अगर हां तो इसका जवाब आ गया है! हाल ही में आई आईपीई ग्लोबल और ईएसआरआई इंडिया की रिपोर्ट की मानें तो भारत के शहरों में 2030 तक हीटवेव के दिनों में दोगुनी वृद्धि और अत्यधिक वर्षा की घटनाएं भी बढ़ेंगी। 

रिपोर्ट में चिंता की बात यह है कि 2030 तक जलवायु परिवर्तन से भारतभर में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं की तीव्रता में 43% की वृद्धि होने की आशंका है, जिससे देश अधिक गर्म और आर्द्र हो जाएगा। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के ग्रिडेड वर्षा (25 किमी रिजॉल्यूशन) और तापमान डेटा (50 किमी रिजॉल्यूशन) का भी इन घटनाओं पर नजर रखने के लिए उपयोग किया जाता है।

जोखिमों पर है नजर

हालांकि, सरकार मौसम की मार से बचने के लिए कई कदम उठा रही है। इसकी निगरानी भी की जा रही है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले आईएमडी, भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के सहयोग से जलवायु खतरों पर नजर रखने के लिए जोखिमों का आकलन किया रहा है। ये प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान के लिए दृष्टिकोण प्रदान करता है।

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