नई दिल्ली: ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भारत ने अगले 10 साल का रोडमैप तैयार कर लिया है। इसमें आर्थिक विकास को गति देने के साथ इनोवेशन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना शामिल है। असल में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (आईएन-एसपीएसीई) ने इसरो, एनजीई और एक प्रमुख एडवाइजर फर्म के सहयोग से बाजार अध्ययन करके दशकीय विजन और रणनीति रिपोर्ट तैयार की है। यह रिपोर्ट 10 साल में भारत के अंतरिक्ष उद्योग और आर्थिक संभावनाओं को दिशा देने के लिए तैयार की गई है।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में कहा कि 2020 में ऐतिहासिक अंतरिक्ष सुधारों के साथ केंद्र सरकार ने भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र को उदार बनाया है। अंतरिक्ष विभाग (डीओएस) में एक स्वायत्त, एकल-खिड़की, स्वतंत्र नोडल एजेंसी, भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (आईएन-एसपीएसीई) का गठन किया है। ताकि अंतरिक्ष गतिविधियों के संपूर्ण स्पेक्ट्रम में निजी खिलाड़ियों व गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) की साझेदारी को सुविधाजनक बनाया जा सके। इससे इसके विस्तार में भी मदद मिलेगी।
यह है रोडमैप
- इंडियन स्पेस सेक्टर के लिए रेगुलेटरी और पॉलिसी प्रेमवर्क मुहैया कराना
- स्पेस एक्टिविटी की सुविधा और प्राधिकरण तथा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) के लिए व्यापार करने में सुलभता
- एनजीई को तकनीकी ट्रांसफर (टीओटी) को बढ़ावा देना और सक्षम बनाना
- महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और तकनीकी सुविधाओं तक पहुंच को सक्षम बनाना
- पृथ्वी अवलोकन के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशीप (पीपीपी)
- राज्यों में मैन्युफेक्चरिंग और मैन्युफेक्चरिंग क्लस्टरों के विकास को प्रोत्साहन
- उद्योग को स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च वीकल (SSLV) का तकनीकी ट्रांसफर
- स्पेस स्टार्टअप और एमएसई के लिए फाइलेंसियल सपोर्ट स्कीम
- अंतरिक्ष क्षेत्र केंद्रित 1000 करोड़ रुपये का अंतरिक्ष वेंचर कैपिटल फंड स्थापित करना
- प्रतिभा पूल निर्माण के लिए कौशल विकास और अंतरिक्ष पाठ्यक्रम
- कक्षीय संसाधनों और अंतरिक्ष मानकों तक पहुंच
- अंतरिक्ष अनुप्रयोगों को अपनाने के लिए मांग सृजन अभियान
- वित्त तक पहुंच और निवेशक जागरूकता अभियान
- अंतरराष्ट्रीय पहुंच और अंतरिक्ष कूटनीति

यह जो पहल हैं, उनको रणनीतिक रूप से योजनाबद्ध किया जाता है। नियमित रूप से निगरानी होती है। और समय-समय पर इनका मूल्यांकन किया जाता है। भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र देश की तकनीकी और आर्थिक विकास गाथा में एक परिवर्तनकारी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। इसलिए इसे आर्थिक विस्तार के एकमात्र इंजन के बजाय एक रणनीतिक प्रवर्तक के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
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अंतरिक्ष को सभी क्षेत्रों में सक्षमः इसके लिए कृषि, आपदा प्रबंधन, शहरी विकास, रसद, जलवायु कार्रवाई, रक्षा और डिजिटल सेवाओं के साथ गहराई से एकीकृत किया जाना चाहिए, जिससे आर्थिक अति-निर्भरता के जोखिम को कम किया जा सकेगा।
क्रॉस-सेक्टर नवाचार को बढ़ावाः एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों के साथ अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी अभिसरण यह सुनिश्चित करेगा कि लाभ वितरित हों और पारस्परिक रूप से सुदृढ़ हों।
एक विविध प्रौद्योगिकी इकोः सिस्टम के पोषण पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक संतुलित नवाचार पोर्टफोलियो को बढ़ावा देना है। अंतरिक्ष के साथ-साथ अन्य उच्च-विकास क्षेत्रों (अर्धचालक, विद्युत गतिशीलता, फिनटेक आदि) का समर्थन करना है। इससे आर्थिक मजबूती भी सुनिश्चित हो सकेगी। बेशक अंतरिक्ष क्षेत्र को वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़े।
राजकोषीय और नीतिगत प्राथमिकताओं में संतुलनः यह सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत और निवेश सुरक्षा-व्यवस्था का निर्माण करें। अंतरिक्ष को प्रोत्साहित करते हुए विनिर्माण, एमएसएमई और हरित ऊर्जा जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी समान जोर दिया जाना चाहिए। सार्वजनिक-निजी निवेश रणनीतियों को किसी एक क्षेत्र में पूंजी के अत्यधिक संकेन्द्रण से बचना चाहिए।
भारत को, एक विविधीकृत नवाचारः नेतृत्व वाले विकास मॉडल के माध्यम से, जहां अंतरिक्ष एक एकीकरणकर्ता और प्रवर्तक के रूप में कार्य करता है, सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को अधिक वितरित और समावेशी बनाने के लिए अंतरिक्ष का उपयोग करना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि भारत का आर्थिक विकास का रास्ता किसी भी प्रमुख क्षेत्र या प्रौद्योगिकियों पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम के बिना संतुलित, प्रतिस्कंदी और समावेशी बना रहे।
(…कहानी अभी जारी है)



