गयाजी: पितृपक्ष समाप्त होने से एक दिन पहले राष्ट्रपति मुर्मू पिंडदान करने के लिए गयाजी पहुंची। विष्णुपद मंदिर में पूरे विधि-विधान के साथ उनके पुरोहित ने पिंडदान की प्रक्रिया सम्पन्न कराई। इसके बाद उनके पुरोहित ने राष्ट्रपति को पूर्व में उनके पूर्वजों द्वारा किए गए पिंडदान से संबंधित दस्तावेज भी दिखाए। 21 सितंबर को पितृपक्ष का आखिरी दिन है।
इस मौके पर स्थानीय पुरोहित मंगल झांगर ने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के द्वारा अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति को लेकर पिंडदान कर्मकांड किया गया है। पूरे धार्मिक विधि विधान के अनुसार पिंडदान की प्रक्रिया संपन्न कराई गई। उन्होंने कहा कि इस दौरान राष्ट्रपति को गयाजी में होने वाले पिंडदान कर्मकांड के महत्व के बारे में भी जानकारी दी गई है। द्रौपदी मुर्मू के द्वारा पहली बार गयाजी आकर पिंडदान कर्मकांड किया गया है। इससे पहले उनके पूर्वजों ने भी यहां पिंडदान किया था, इससे संबंधित दस्तावेज भी उन्हें दिखाए गए।
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उन्होंने कहा कि विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के द्वारा कुछ दिन पूर्व यह सूचना दी गई थी कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पिंडदान करने गया आ रही हैं। इसके बाद आज पिंडदान कर्मकांड संपन्न कराया गया है। पिंडदान करने के बाद वे वापस लौट गई।
गयाजी के बारे में
गया जी बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर है, और यह गया जी जिले का मुख्यालय भी है। यह प्राचीन शहर फाल्गु नदी (निरंजना, जैसा कि रामायण में उल्लेख किया गया है) के तट पर है। यह जगह हिंदुओं, बौद्धों और जैनियों के बीच पवित्र मानी जाती है। यह छोटी चट्टानी पहाड़ियों (मंगला-गौरी, श्रृंगा-स्थान, राम-शिला और ब्रह्मयोनी) से घिरा हुआ है और नदी पूर्वी तरफ बहती है। गया का नाम पौराणिक राक्षस गयासुर (जिसका शाब्दिक अर्थ है गया राक्षस) से लिया गया है।
विष्णु पद मंदिर के बारे में
गया के फल्गु नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर एक पवित्र हिंदू मंदिर है जो भगवान विष्णु के चरणचिह्न को समर्पित है। यह मंदिर पितरों के मोक्ष के लिए किए जाने वाले पिंडदान के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। 18वीं शताब्दी में मराठा महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया गया था, जबकि इसका मूल स्वरूप रामायण काल से है।



