दिल्ली-मुंबई में प्रदूषण, 2025 तक दोगुनी समस्या की चेतावनी

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि दिल्ली-एनसीआर और मुंबई जैसे शहरों में ओजोन का स्तर राष्ट्रीय मानकों से बुरी तरह पार हो रहा है

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नई दिल्ली: देश के प्रमुख महानगरों में ग्राउंड-लेवल ओजोन प्रदूषण की समस्या अब चरम पर पहुंच चुकी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि दिल्ली-एनसीआर और मुंबई जैसे शहरों में ओजोन का स्तर राष्ट्रीय मानकों से बुरी तरह पार हो रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल कदम न उठाए गए, तो 2025 के अंत तक यह संकट दोगुना हो सकता है, जिससे फेफड़ों की बीमारियां, अस्थमा और फसल नुकसान जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सौंपी गई सीपीसीबी की 25 सितंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में देशभर के 178 निगरानी स्टेशनों में से 65 पर ओजोन स्तर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) से 2 प्रतिशत से अधिक ऊंचा दर्ज किया गया। एनएएक्यूएस के अनुसार, 8-घंटे का औसत ओजोन स्तर 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 1-घंटे का 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन दिल्ली-एनसीआर में 21 स्टेशन और मुंबई में कई स्टेशन इस सीमा को पार कर चुके हैं।

गर्मियों में बिगड़ती हवा, रातों में भी खतरा

रिपोर्ट में बताया गया है कि गर्मी और सूरज की तेज रोशनी ओजोन निर्माण को तेज करती है, जिससे अप्रैल से जुलाई तक स्थिति सबसे गंभीर हो जाती है। 2023 में इस दौरान 10 स्टेशनों पर 1-घंटे के उल्लंघन दर्ज हुए, जिनमें दिल्ली के 6 और मुंबई के 3 शामिल थे। लेकिन 2024 में यह संख्या 24 तक पहुंच गई। दिल्ली के 21, चेन्नई के 2 और हैदराबाद के 1 स्टेशन। चौंकाने वाली बात यह है कि रात के समय भी खतरा कम नहीं: 2023 में 8 स्टेशनों पर ओजोन स्तर मानक से ऊपर पाया गया, जिसमें दिल्ली के 6 स्टेशन प्रमुख थे। सीपीसीबी के वैज्ञानिक ‘ई’ आदित्य शर्मा ने रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि ओजोन जमीनी स्तर पर वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (वीओसी), नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (एनओएक्स), कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) और मीथेन (सीएच4) से बनता है। ये प्रदूषक वाहनों, बिजली संयंत्रों, उद्योगों और कचरा जलाने से निकलते हैं। प्राकृतिक स्रोत जैसे जंगल की आग और मिट्टी से निकलने वाली गैसें भी इसमें योगदान दे रही हैं।

एनजीटी की सख्ती: विशेषज्ञ समिति का ऐलान

एनजीटी ने 20 अगस्त 2024 को इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान सीपीसीबी को डेटा विश्लेषण का आदेश दिया था। अदालत ने सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट पर आधारित एक मीडिया रिपोर्ट का स्वत: संज्ञान लिया, जिसमें ओजोन की खतरनाक वृद्धि का जिक्र था। अब एनजीटी ने पर्यावरण मंत्रालय और सीपीसीबी से ओजोन नियंत्रण के लिए विशेषज्ञ समिति गठन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है। मंत्रालय जल्द ही समिति की शर्तें तय करेगा।

स्वास्थ्य पर गहरा असर: युवाओं में हार्ट अटैक का खतरा

ओजोन प्रदूषण केवल सांस की बीमारियां ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि हृदय रोगों को भी न्योता दे रहा है। ‘जियोहेल्थ’ जर्नल में प्रकाशित एक अमेरिकी अध्ययन के अनुसार, बढ़ते ओजोन स्तर से 18-55 वर्ष के युवाओं में हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ रहा है। अध्ययन में 2,322 मरीजों (जिनमें 70 प्रतिशत महिलाएं) के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिसमें ओजोन और पीएम 2.5 कणों के स्तर को हार्ट अटैक घटनाओं से जोड़ा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और गंभीर बनाएगा।

नियंत्रण के उपाय: तुरंत कार्रवाई जरूरी

सीपीसीबी ने सुझाव दिए हैं कि वाहनों के धुएं को कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दें, फैक्टरियों में उन्नत फिल्टर लगाएं और शहरों में हरियाली बढ़ाएं। विशेषज्ञों ने कहा, अभी से कदम उठाएं, वरना 2025 तक समस्या दोगुनी हो जाएगी।

ओजोन प्रदूषण: एक नजर में क्या है? तीन ऑक्सीजन अणुओं से बनी गैस। ऊंचाई पर सुरक्षात्मक, लेकिन जमीनी स्तर पर हानिकारक।

कारण: वाहन/उद्योग से निकलने वाले एनओएक्स, वीओसी और सीओ की सूरज की रोशनी में प्रतिक्रिया। गर्मी इसे तेज करती है।

प्रभाव: श्वसन समस्या, अस्थमा, फसल क्षति और हृदय रोग।

समाधान: प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण, पेड़ लगाना और नीतिगत कदम।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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