जैसलमेर: राजस्थान के जैसलमेर में पहली बार एक 9 वर्षीय बच्चे में Fibrodysplasia Ossificans Progressiva (एफओपी) नामक अत्यंत दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी सामने आई है। इसे आम भाषा में “स्टोन मैन सिंड्रोम” कहा जाता है। यह बीमारी इतनी दुर्लभ है कि लगभग 15 से 20 लाख लोगों में से केवल एक व्यक्ति ही इससे प्रभावित होता है, जबकि दुनिया भर में अब तक इसके करीब 700–800 मामले ही दर्ज किए गए हैं।
क्या है “स्टोन मैन सिंड्रोम”?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक ऐसी आनुवंशिक स्थिति है जिसमें शरीर की मांसपेशियां, लिगामेंट्स और सॉफ्ट टिश्यू धीरे-धीरे हड्डियों में बदलने लगते हैं।
इस प्रक्रिया के कारण शरीर धीरे-धीरे कठोर होता जाता है और व्यक्ति की चलने-फिरने की क्षमता सीमित हो जाती है।
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. दिनेश जांगिड़ ने बताया कि यह बीमारी शरीर में अतिरिक्त हड्डी निर्माण (abnormal bone formation) के कारण होती है, जिससे सामान्य गतिविधियां प्रभावित होती हैं।
क्यों कहा जाता है “स्टोन मैन सिंड्रोम”?
डॉक्टरों के मुताबिक, इस बीमारी में शरीर के सॉफ्ट टिश्यू धीरे-धीरे हड्डियों में बदल जाते हैं, जिससे शरीर की लचक खत्म हो जाती है और वह पत्थर की तरह सख्त हो जाता है।
इसी वजह से इसे “स्टोन मैन सिंड्रोम” नाम दिया गया है।
क्या यह बीमारी परिवार में आगे बढ़ सकती है?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक जेनेटिक डिसऑर्डर है, जो ACVR1 जीन में बदलाव के कारण होता है।
• ज्यादातर मामलों में यह नया (स्पॉन्टेनियस) म्यूटेशन होता है
• जरूरी नहीं कि माता-पिता या परिवार में पहले से यह बीमारी हो
• हालांकि, यदि किसी व्यक्ति में यह मौजूद है, तो आगे आने वाली पीढ़ी में इसके ट्रांसफर होने की संभावना रहती है
लक्षण क्या हैं?
• पैर के अंगूठे का टेढ़ापन (जन्म से)
• शरीर में सूजन या गांठें
• धीरे-धीरे ये गांठें हड्डियों में बदलना
• शरीर की मूवमेंट कम होना
ये लक्षण आमतौर पर बचपन में ही दिखने लगते हैं।
इलाज और खतरे
डॉक्टरों के अनुसार, इस बीमारी का अभी तक कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है।
• छोटी चोट, सर्जरी या इंजेक्शन से बीमारी तेजी से बढ़ सकती है
• इसलिए मरीज को विशेष सावधानी और ट्रॉमा से बचाव बेहद जरूरी है
भारत में इलाज और सपोर्ट की स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इस बीमारी के लिए सीमित लेकिन विकसित होती सुविधाएं उपलब्ध हैं।
• बड़े संस्थानों में जेनेटिक काउंसलिंग और मैनेजमेंट संभव है
• लेकिन जागरूकता और शुरुआती पहचान की कमी अभी भी बड़ी चुनौती है
जागरूकता की पहल
इस मामले के सामने आने के बाद AIIMS Jodhpur द्वारा राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति 2021 के तहत एक जागरूकता कार्यशाला आयोजित की गई।
इसका उद्देश्य डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को इस दुर्लभ बीमारी के बारे में बेहतर जानकारी देना है।
निष्कर्ष
एफओपी जैसी दुर्लभ बीमारियां न केवल चिकित्सा चुनौती हैं, बल्कि सामाजिक जागरूकता की भी परीक्षा हैं। समय पर पहचान, सही देखभाल और सतर्कता से मरीज की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है।



