वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में भारत का बढ़ता दबदबा, फार्मा सेक्टर बना ‘दुनिया की फार्मेसी’

भारत का फार्मास्यूटिकल क्षेत्र आज वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभरकर सामने आया है।

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नई दिल्ली: भारत का फार्मास्यूटिकल क्षेत्र आज वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभरकर सामने आया है। “स्वदेश में उत्पादन से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार तक” की सोच के साथ यह सेक्टर न केवल देश की आर्थिक वृद्धि को गति दे रहा है, बल्कि दुनिया भर में किफायती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित कर रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, भारतीय फार्मा उद्योग मात्रा के हिसाब से दुनिया का तीसरा और मूल्य के आधार पर 11वां सबसे बड़ा उद्योग बन चुका है। वर्तमान में घरेलू बाजार का आकार 60 अरब अमेरिकी डॉलर है, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर 130 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

तेजी से बढ़ता कारोबार और निर्यात


वित्त वर्ष 2024-25 में इस क्षेत्र का वार्षिक कारोबार 4.72 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वहीं, फार्मा निर्यात 30.5 अरब डॉलर रहा, जो वर्ष 2000-01 के 1.9 अरब डॉलर की तुलना में लगभग 16 गुना अधिक है। भारत ने 2024-25 में 191 देशों को दवाओं का निर्यात किया, जिसमें अमेरिका और यूरोप जैसे सख्त नियामक बाजार भी शामिल हैं।

भारत आज दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है और वैश्विक आपूर्ति में लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। देश में 3,000 से अधिक फार्मा कंपनियां और 10,500 से ज्यादा विनिर्माण इकाइयां कार्यरत हैं।

वैश्विक टीका आपूर्ति में अग्रणी


भारत डिप्थीरिया, टिटनेस, बीसीजी और खसरा जैसे टीकों की वैश्विक आपूर्ति में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भारतीय कंपनियां यूनिसेफ को करीब 60 प्रतिशत टीकों की आपूर्ति करती हैं, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की खसरा वैक्सीन की 90 प्रतिशत मांग भारत पूरा करता है।

विदेशी निवेश और विस्तार


फार्मा क्षेत्र में विदेशी निवेश भी तेजी से बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 (अप्रैल-सितंबर) के दौरान 13,193 करोड़ रुपये का एफडीआई दर्ज किया गया, जो इस क्षेत्र में बढ़ते वैश्विक भरोसे को दर्शाता है।

सरकार की नीतियों से मिली मजबूती


सरकार द्वारा चलाई जा रही उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं ने घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया है और आयात पर निर्भरता कम की है। इसके साथ ही, बल्क ड्रग्स और मेडिकल डिवाइस पार्कों के विकास से इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती मिली है।

केंद्रीय बजट 2026-27 में ‘बायोफार्मा शक्ति’ पहल की घोषणा की गई है, जिसके तहत अगले पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये खर्च कर भारत को वैश्विक बायोफार्मास्यूटिकल हब बनाने की तैयारी है।

किफायती दवाओं की पहुंच बढ़ी


प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना के तहत देशभर में 18,000 से अधिक केंद्र खोले जा चुके हैं, जहां सस्ती दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे आम लोगों के स्वास्थ्य खर्च में भारी कमी आई है।

नए व्यापार समझौते खोल रहे अवसर


यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ हुए व्यापार समझौते भारतीय फार्मा कंपनियों को बड़े वैश्विक बाजारों तक आसान पहुंच प्रदान कर रहे हैं। इससे निर्यात, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

निष्कर्ष


मजबूत नीतियों, बढ़ते निर्यात, वैश्विक भरोसे और किफायती दवाओं की उपलब्धता के चलते भारत का फार्मास्यूटिकल क्षेत्र लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। आने वाले वर्षों में यह सेक्टर न केवल भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में भी अपनी निर्णायक भूमिका निभाता रहेगा।

Samiksha Mishra

samiksha.mishra1222@gmail.com

मैं कॉपीराइटर हूँ, जिसे कंटेंट के ज़रिए कहानियाँ गढ़ने और ब्रांड्स की आवाज को मजबूती देने का तीन वर्षों का पेशेवर अनुभव है। शब्दों की सटीकता, रचनात्मकता और पाठकों से जुड़ाव, यही मेरी लेखनी की पहचान है।

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