डिजिटल कृषि मिशन से समृद्ध हो रही भारत की खेती किसानी

तकनीक से देश में खेती का परिदृश्य में बदलाव आया है। किसान का सहूलियत होने के साथ इसने आय में बढ़ोत्तरी भी की है। डिजिटल कृषि मिशन इसमें मददगार बना है।

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नई दिल्ली: देश का एग्रीकल्चर सेक्टर तेजी से बदल रहा है। इससे न केवल खेती की राह आसान हो रही है, बल्कि किसानों की आय बढ़ने के रास्ते भी खुल रहे हैं। सरकार ने इसी उद्देश्य से पिछले साल सितंबर पर डिजिटल कृषि मिशन को मंजूरी दी। इसमें लिए एग्रीस्टैक, एग्रीकल्चरल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम, पैदावार बढ़ाने (मृदा उर्वरता ) एवं प्रोफाइल मैप जैसे डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की परिकल्पना है। 

मजबूत होगा डिजिटल एग्रीकल्चर ईकोसिस्टम

मजबूत डिजिटल एग्रीकल्चर ईकोसिस्टम स्थापित होगा। कृषक-केंद्रित नवीन डिजिटल समाधान को बढ़ावा मिलेगा और सभी किसानों को समय पर फसल संबंधी जानकारी मिल सकेगी। डिजिटल कृषि अवसंरचना एग्रीस्टैक में कृषि क्षेत्र से जुड़ी तीन मूलभूत रजिस्ट्री या डेटाबेस – भू-संदर्भित ग्राम मानचित्र, फसल बुआई रजिस्ट्री और किसान रजिस्ट्री शामिल हैं। इन रजिस्ट्रियों को बनाने और इनका रखरखाव राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से की जाती है।

क्या है किसान रजिस्ट्री

किसान रजिस्ट्री किसानों के जनसांख्यिकीय विवरण, जोत भूमि और बोई गई फसल के बारे में व्यापक और उपयोगी डेटा प्रदान करती है। इससे किसान ऋण, बीमा, खरीद आदि लाभों और अन्‍य सेवाओं के लिए अपनी डिजिटल पहचान स्‍थापित और उन्‍हें सत्‍यापित कर सकते हैं। यह राज्यों को किसानों के लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था तक पहुंच के उपाय सुगम बनाते हैं जिससे किसान कृषि लागत और उपज की ऑनलाइन खरीद-बिक्री कर सकें। डिजिटल फसल सर्वेक्षण (डीसीएस) प्रणाली प्रत्येक कृषि भूखंड के बारे में सटीक और वास्तविक समय में फसल की जानकारी देती है।

किसानों को मिलेंगी ये जानकारियां

कृषि निर्णय समर्थन प्रणाली भू-स्थानिक और गैर-भू-स्थानिक डेटा को समेकित और मानकीकृत करता है। इससे मौसम, मिट्टी, फसल के लक्षण, जलाशय और भूजल डेटा की जानकारी मिलती है। कृषि निर्णय समर्थन प्रणाली फसल मानचित्र, मृदा मानचित्र, स्वचालित उपज अनुमान मॉडल, सूखा/बाढ़ की निगरानी पुख्ता करता है। इससे सरकार को साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सहायता मिलती है और अनुसंधान संस्थानों और कृषि प्रौद्योगिकी उद्योग को नवीन समाधान देने में सुगमता होती है।

सॉइल रिसोर्स मैपिंग प्रोजेक्ट (SRMP)

भारतीय मृदा एवं भू-उपयोग सर्वेक्षण (एसएलयूएसआई) ने सॉइल रिसोर्स मैपिंग प्रोजेक्ट (SRMP) शुरू किया है। इसके जरिये ठिकाऊ कृषि को बूस्ट करने के लिए हाई रिज़ॉल्यूशन वाली सैटेलाइट और जमीनी आंकड़ों के उपयोग से 1:10,000 पैमाने पर ग्रामीण स्तर पर मृदा सूची तैयार कर रही है।

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प्रति बूंद अधिक फसल

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग वर्ष 2015-16 टसे देश में केंद्र प्रायोजित योजना “प्रति बूंद अधिक फसल” क्रियान्वित कर रहा है। यह योजना सूक्ष्म सिंचाई, अर्थात् ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों द्वारा खेतों में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है। सूक्ष्म सिंचाई से जल की बचत के साथ ही कम उर्वरक के प्रयोग – फर्टिगेशन (उर्वरक-सिंचाई प्रणाली जिसमें पौधों को उर्वरक सिंचाई के पानी के साथ मिलाकर दिया जाता है), श्रम में लगने वाले व्यय, अन्य  लागत खर्च में कमी लाई जाती है जिससे अंतत: किसानों की समग्र आय में वृद्धि होती है।

सरकार करती है आर्थिक मदद

पीडीएमसी के अंतर्गत ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली लगाने के लिए छोटे और सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत की दर से वित्तीय सहायता देती है। राज्य सरकारें भी राज्य बजट में किसानों को सब्सिडी देती है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली स्थापित करने के लिए प्रति लाभार्थी 5 हेक्टेयर तक सहायता सीमित है।

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