स्मृति शेष: नहीं रहे फौजा सिंह, 114 साल में ली अंतिम सांस

जालंधर में एक अज्ञात वाहन की चपेट में आने से हुई दर्दनाक मौत। फौजा सिंह ने वृद्धावस्था में मैराथन दौडऩा शुरू किया और अपनी सहनशक्ति और एथलेटिक क्षमता के कारण उन्हें टर्बन्ड टॉरनेडो का उपनाम मिला था।

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चंडीगढ़: अनुभवी मैराथन धावक फौजा सिंह की सोमवार को पंजाब के जालंधर में सडक़ दुर्घटना में मृत्यु हो गई। सोमवार को फौजा सिंह का उनके पैतृक गांव ब्यास के पास सड़क हादसे में घायल होने के बाद उन्हें अस्पताल भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 114 वर्ष के थे। फौजा सिंह, जिन्हें प्यार से टर्बन्ड टॉरनेडो कहा जाता था, इस वर्ष एक अप्रैल को 114 वर्ष के हुए थे। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शोक व्यक्त किया है।
जालंधर के एक पुलिस अधिकारी ने भी फौजा सिंह की मृत्यु की पुष्टि करते हुए जानकरी देते हुए बताया कि  वह ब्यास गांव में टहलने निकले थे, तभी किसी अज्ञात वाहन ने उन्हें टककर मार दी थी। इस दुघर्टना में उनके सिर में चोटें आई, जिसके बाद उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां शाम को इलाज के दौरान लउनकी मौत हो गई। जालंधर के आदमपुर पुलिस स्टेशन के एसएचओ हरदेवप्रीत सिंह ने बताया कि दुर्घटना के बाद चालक, जिसकी अभी पहचान नहीं हो पाई है, फरार हो गया. लेकिन चालक के खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने का मामला दर्ज किया गया है।

पीएम मोदी ने जताया शोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फौजा सिंह के निधन पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने एक्स पर कहा फौजा सिंह जी अपने अद्वितीय व्यक्तित्व और फिटनेस जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भारत के युवाओं को प्रेरित करने के तरीके के कारण असाधारण थे। वह अविश्वसनीय दृढ़ संकल्प वाले एक असाधारण एथलीट थे। उनके निधन से मुझे बहुत दुख हुआ। मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और दुनिया भर में उनके अनगिनत प्रशंसकों के साथ हैं।

कौन थे फौजा सिंह
वर्ष 1911 में एक किसान परिवार में जन्मे, फौजा सिंह चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। वह सौ वर्ष की उम्र में मैराथन पूरी करने वाले पहले एथीलीट बने और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेते हुए कई रिकॉर्ड भी बनाए।
फौजा सिंह ने वृद्धावस्था में मैराथन दौडऩा शुरू किया और अपनी सहनशक्ति और एथलेटिक क्षमता के कारण उन्हें टर्बन्ड टॉरनेडो का उपनाम मिला था। वह वर्ष 1990 के दशक में इंग्लैंड चले गए और बाद में पंजाब स्थित अपने पैतृक गांव में रहने लौट आए थे।
वह वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक में मशाल वाहक भी थे। फौजा सिंह ने 1999 में चैरिटी के लिए मैराथन दौडऩे का फैसला किया था। उनका पहला ऐसा चैरिटी कार्यक्रम समय से पहले जन्मे शिशुओं के लिए था।

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