नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ बाढ़ या सूखे की बात नहीं, बल्कि यह चुपके से हमारी आने वाली पीढ़ी को कमजोर कर रहा है। एक ताजा रिपोर्ट से साफ हो गया है कि भारत के उन जिलों में, जहां मौसम की मार सबसे ज्यादा पड़ती है, वहां बच्चों के कुपोषित होने का डर 25 प्रतिशत ज्यादा है। मतलब, ऐसे इलाकों में बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम रहने की संभावना कहीं ज्यादा। दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (आईईजी) के एक्सपर्ट्स ने इस डरावनी हकीकत को सामने लाया है। उनका कहना है कि 80 फीसदी भारतीय आबादी ऐसे हाई-रिस्क जोन में रहती है, जहां चरम मौसम जैसे लू, बाढ़ या तूफान सेहत को चोट पहुंचा रहे हैं।
खतरे के जिलों में सेहत का ग्राफ नीचे गिरा
रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि जलवायु जोखिम ज्यादा वाले जिलों में बच्चों के स्टंटिंग (ठिगने) का खतरा 14 फीसदी ऊपर है। यानी, पोषण की कमी से बच्चे की ग्रोथ रुक जाती है। वेस्टिंग, जिसमें बच्चा पतला-पतला हो जाता है। उसका रिस्क भी 6 फीसदी ज्यादा। महिलाओं के केस में तो हाल और बुरा: घर पर डिलीवरी का चांस 38 फीसदी बढ़ गया, जो मां-बच्चे दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है। यह निष्कर्ष ‘प्लोस वन’ जर्नल में छपे स्टडी से आए हैं। रिसर्चर्स ने एनएफएचएस-5 (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे) और सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर ड्रायलैंड एग्रीकल्चर के डेटा का गहरा विश्लेषण किया। 575 ग्रामीण जिलों के 1.54 लाख बच्चों और 4.47 लाख महिलाओं के आंकड़े खंगाले गए। मल्टीवेरिएट लॉजिस्टिक रिग्रेशन जैसी एडवांस स्टैटिस्टिकल मेथड्स से साबित हुआ कि जलवायु का असर सीधा स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। पहले इसे सिर्फ गरीबी या एजुकेशन की समस्या माना जाता था, लेकिन अब साफ है कि ग्लोबल वॉर्मिंग सब कुछ बिगाड़ रही है।
क्यों बढ़ रही है मुसीबत?
स्टडी बताती है कि हाई-रिस्क जिलों में बुनियादी सुविधाएं कमजोर हैं। बाढ़ या हीटवेव से हॉस्पिटल्स प्रभावित होते हैं, दवाइयां पहुंचाना मुश्किल। नतीजा? कुपोषण बढ़ता है, इम्यूनिटी गिरती है। विशेषज्ञ चेताते हैं कि अगर जलवायु को इग्नोर किया गया, तो एसडीजी गोल्स (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) हासिल करना नामुमकिन। भारत जैसे देश में, जहां 2025 तक हीटवेव की घटनाएं 20% बढ़ चुकी हैं, यह अलार्मिंग है।
क्या करें? तुरंत एक्शन लें
एक्सपर्ट्स की सलाह साफ: हेल्थ पॉलिसी में क्लाइमेट एडाप्टेशन को जगह दें। जोखिम वाले जिलों के लिए स्पेशल प्लान, जैसे मोबाइल हेल्थ यूनिट्स, न्यूट्रिशन किट्स और क्लाइमेट-रेजिलिएंट क्रॉप्स। सरकार को एनएचएम (नेशनल हेल्थ मिशन) में ये बदलाव लाने होंगे। आईईजी के लीड रिसर्चर डॉ. प्रेम रंगन ने कहा, जलवायु संकट को हेल्थ चैलेंज मानें, वरना आने वाली जनरेशन भुगतेगी।



