नई दिल्ली। हिमालय की पूर्वी ढलानों पर बसे घने, ठंडे जंगलों में एक चुपचाप फैलता खतरा अब सामने आ रहा है। यहां की शांत वादियों में छिपे छोटे-छोटे कीटभक्षी पक्षी, जो पेड़ों की घनी छांव और नम हवा पर निर्भर हैं, तेजी से लुप्त हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मूल कारण जंगलों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ना है, जो इन पक्षियों के रहने-सहने के स्थान को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के वैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर हुआ है, जिसके निष्कर्ष ब्रिटिश इकोलॉजिकल सोसाइटी के प्रतिष्ठित पत्रिका ‘जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी’ में छपे हैं।
इस शोध में भारतीय टीम ने अरुणाचल प्रदेश के प्रसिद्ध ईगल्स नेस्ट वन्यजीव अभयारण्य में पूरे एक दशक (2011 से 2021 तक) पक्षियों की स्थिति पर नजर रखी। मुख्य फोकस था चयनित पेड़ों की अवैध या नियंत्रित कटाई (सेलेक्टिव लॉगिंग) के बाद जंगल के स्थानीय मौसम में होने वाले बदलावों का इन छोटे पक्षियों पर पड़ने वाला असर। शोधकर्ताओं ने हल्के एल्यूमिनियम रिंग्स से पक्षियों को चिह्नित किया और हर साल वही स्पॉट्स पर जाकर उनकी आबादी, शरीर के वजन और उत्तरजीविता दर का डेटा इकट्ठा किया। इसके अलावा, बिना कटाई वाले प्राकृतिक जंगलों और प्रभावित क्षेत्रों में थर्मामीटर व ह्यूमिडिटी सेंसर लगाकर तापमान-नमी के उतार-चढ़ाव को ट्रैक किया गया। उद्देश्य था समझना कि ये छांव-पसंदीदा कीटभक्षी पक्षी अपने सूक्ष्म जलवायु (माइक्रोक्लाइमेट) में आने वाली इन चुनौतियों से कैसे जूझते हैं।
कटाई से जंगल का मौसम बेतरतीब
रिपोर्ट के मुताबिक, जहां पेड़ काटे गए, वहां दिन का तापमान असहनीय रूप से ऊंचा हो जाता है, हवा शुष्क हो जाती है, जबकि रातें सामान्य से कहीं ज्यादा सिहरन भरी होती हैं। पेड़ों की प्राकृतिक छत गायब होने से ये माइक्रोक्लाइमेट में भारी अस्थिरता आ जाती है। पूर्वी हिमालय के ये पक्षी ‘थर्मल स्पेशलिस्ट’ कहलाते हैं, यानी वे स्थिर, ठंडी और नम स्थितियों के आदी हैं। ऐसे में ये बदलाव उनके लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। शोधकर्ता चिंता जता रहे हैं कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन इस दबाव को और तेज कर सकता है, क्योंकि ये प्रजातियां बारीक तापमान बदलावों के प्रति बेहद नाजुक हैं।
वजन घटा, उम्र छोटी
शोध में पाया गया कि जो पक्षी प्रजातियां बदले माहौल में भी सुरक्षित ‘माइक्रो-रिफ्यूज’ यानी छोटे-छोटे छिपने के स्थान खोज लेती हैं, वे फिलहाल टिके हुए हैं। लेकिन जिन्हें पुरानी जैसी शीतलता नहीं मिल पाती, उनकी संख्या में भारी गिरावट आ रही है। इनका वजन कम हो रहा है और लंबे समय तक जीवित रहने की दर भी घट रही है। प्रमुख शोधकर्ता अक्षय भारद्वाज ने बताया, हमारा लक्ष्य यही है कि समझें कुछ पक्षी कटाई के बाद भी कैसे बचे रहते हैं, जबकि अन्य इतनी जल्दी क्यों मिट रहे हैं। ये जानना संरक्षण के लिए कुंजी है।
संरक्षण की राह
शोध के आधार पर वैज्ञानिकों ने ठोस सिफारिशें की हैं। सबसे पहले, विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक जंगलों को प्राथमिकता से सुरक्षित रखना जरूरी है। जहां पहले ही क्षति हो चुकी है, वहां पक्षी-अनुकूल माइक्रोक्लाइमेट बहाल करने के उपाय अपनाए जाएं। जैसे कृत्रिम छांवें लगाना, छोटे जलाशय बनाना या घनी झाड़ियां लगाना। इनसे कमजोर प्रजातियों को उनके मूल जैसे सुरक्षित कोने मिल सकेंगे।
ये भी पढ़ें-क्वांटम टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने के लिए आंध्र को C-DOT का साथ
चेतावनी साफ
अगर ये कीटभक्षी पक्षी गायब हो गए, तो जंगलों में कीड़ों का प्रकोप बढ़ेगा, जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को चरमरा देगा। शोध बताता है कि जंगल कटाई के बाद प्रजातियों की गिरावट के पीछे माइक्रोक्लाइमेट ही मुख्य वजह है। लंबे अवधि के डेटा से ही सही रणनीतियां बनेंगी, खासकर जब ग्लोबल वार्मिंग से तापमान चढ़ रहा है। इन छोटे-छोटे ‘लाइफलाइन’ हैबिटेट ही भविष्य में कई प्रजातियों को बचा पाएंगे।



