पटना: भारत की तकनीकी यात्रा आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। जहाँ एक तरफ पूरी दुनिया डिजिटल क्रांति के नए युग में प्रवेश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ इस डिजिटल युग की ‘रीढ़ की हड्डी’ माने जाने वाले सेमीकंडक्टर चिप्स की मांग आसमान छू रही है। हाल ही में पटना स्थित ‘सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया’ (STPI) केंद्र के दौरे पर आए केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक संदेश साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में कुशल मानव संसाधन की एक बड़ी कमी है और भारत इस खाली जगह को भरने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है।
सेमीकंडक्टर: आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार
सेमीकंडक्टर चिप्स आज हर उस चीज़ का आधार हैं जिसे हम इस्तेमाल करते हैं—चाहे वह हमारा स्मार्टफोन हो, लैपटॉप, कारें, या फिर भविष्य की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और 5G तकनीक। अश्विनी वैष्णव के अनुसार, वर्तमान में वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग लगभग 800 अरब डॉलर का है, और अगले एक साल के भीतर इसके 1 ट्रिलियन डॉलर (1 लाख करोड़ डॉलर) के जादुई आंकड़े को पार करने की पूरी संभावना है।
यह वृद्धि केवल वित्तीय आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार के लाखों नए अवसरों का भी द्वार खोल रही है। मंत्री ने बताया कि वर्ष 2032 तक सेमीकंडक्टर क्षेत्र में 10 लाख नई नौकरियों के अवसर पैदा होंगे, लेकिन चिंता की बात यह है कि उद्योग अभी से ही 10 लाख कुशल पेशेवरों की कमी से जूझ रहा है। यहीं पर भारत की भूमिका और उसकी रणनीतिक तैयारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत की दोहरी रणनीति: डिजाइन और निर्माण
अश्विनी वैष्णव ने इस अवसर को भुनाने के लिए दो प्रमुख स्तंभों पर जोर दिया है: सेमीकंडक्टर डिजाइन और सेमीकंडक्टर निर्माण (Manufacturing)।
- सेमीकंडक्टर डिजाइन: भारत पहले से ही सॉफ्टवेयर क्षेत्र में अपनी धाक जमा चुका है। अब सरकार का लक्ष्य भारतीय छात्रों को सेमीकंडक्टर डिजाइन के क्षेत्र में दुनिया का सबसे कुशल इंजीनियर बनाना है। मंत्री ने कहा कि, “हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जब हमारे छात्र सेमीकंडक्टर डिजाइन का कौशल लेकर कॉलेजों से बाहर निकलें, तो उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाशाली पेशेवरों में गिना जाए और उन्हें वैश्विक कंपनियों में तुरंत काम के अवसर मिलें।”
- सेमीकंडक्टर निर्माण: भारत केवल डिजाइन तक सीमित नहीं रहेगा। ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के तहत, देश में चिप निर्माण और पैकेजिंग की प्रक्रियाएं पहले ही शुरू हो चुकी हैं। जैसे-जैसे देश में उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, सरकार उन निर्माण कार्यों के अनुकूल कौशल विकास और प्रशिक्षण कार्यक्रम भी तैयार करेगी ताकि स्थानीय स्तर पर कुशल श्रम शक्ति उपलब्ध हो सके।
75 हजार से 5 लाख तक का सफर
सरकार की योजनाओं के परिणाम भी दिखने लगे हैं। अब तक देश में सेमीकंडक्टर डिजाइन से संबंधित कार्यक्रमों के माध्यम से लगभग 75 हजार छात्रों को न केवल प्रशिक्षण मिला है, बल्कि उन्हें उद्योग में आकर्षक अवसर भी प्राप्त हुए हैं। लेकिन सरकार का लक्ष्य इससे कहीं अधिक बड़ा है। अश्विनी वैष्णव ने दृढ़ता के साथ कहा कि हमारा लक्ष्य इन लाभान्वित छात्रों की संख्या को 75 हजार से बढ़ाकर 5 लाख तक पहुंचाना है। यह भारत को दुनिया की ‘सेमीकंडक्टर राजधानी’ बनाने की दिशा में एक साहसी कदम है।
स्टार्टअप इकोसिस्टम का लोकतंत्रीकरण
पटना जैसे शहरों में एसटीपीआई (STPI) केंद्रों का महत्व और भी बढ़ जाता है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि नवाचार और स्टार्टअप का लाभ केवल महानगरों (जैसे बेंगलुरु, गुड़गांव या हैदराबाद) तक सीमित नहीं रहेगा। सरकार टियर-2 और टियर-3 शहरों में एसटीपीआई केंद्रों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
पटना के एसटीपीआई केंद्र में युवा उद्यमियों के साथ बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम को देश के कोने-कोने तक पहुंचना चाहिए। जब बिहार और अन्य राज्यों के युवा स्थानीय स्तर पर ही विश्वस्तरीय तकनीकी संसाधन पाएंगे, तो न केवल पलायन रुकेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। सरकार इन युवा उद्यमियों की समस्याओं को सुनने और स्टार्टअप नीतियों को और अधिक सरल बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
निष्कर्ष
अश्विनी वैष्णव का दौरा इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल एक उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक ‘निर्माता’ बनने की राह पर चल रहा है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे विजन अब धरातल पर सेमीकंडक्टर के रूप में साकार हो रहे हैं। वैश्विक स्तर पर पेशेवरों की कमी भारत के लिए एक चुनौती से कहीं अधिक एक अवसर है। यदि हम अपने छात्रों को भविष्य की तकनीक के लिए तैयार कर सके, तो भारत न केवल 1 ट्रिलियन डॉलर के उद्योग में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखेगा, बल्कि दुनिया को एक ऐसे कुशल मानव संसाधन का आधार प्रदान करेगा, जिसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है।
आने वाले वर्षों में, जब हम इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के पीछे ‘मेड इन इंडिया’ या ‘डिजाइन इन इंडिया’ का लोगो देखेंगे, तो हमें याद आएगा कि इस यात्रा की शुरुआत भारत के छोटे-बड़े शहरों में तैयार हो रहे उन युवा इंजीनियरों से हुई थी जो आज वैश्विक तकनीक के केंद्र में खड़े हैं।



