नई दिल्ली: अलास्का के एंकोरेज में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आमने-सामने मुलाकात करीब तीन घंटे चली, लेकिन न तो रूस-यूक्रेन युद्धविराम पर कोई सहमति बनी और न ही कोई ठोस समझौता हो सका। इस बैठक के राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत भारत के लिए भी अहम हैं, क्योंकि बातचीत से पहले ट्रंप ने भारत के रूस से तेल आयात को निशाना बनाते हुए बयान दिया था। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह दबाव भारत के जरिए रूस को संदेश देने की ट्रंप की रणनीति का हिस्सा है। अब सवाल यह है क्या Trump-Putin की जुगलबंदी भारत पर पड़ रहे अमेरिकी दबाव को कम करेगी, या यह सिर्फ एक राजनीतिक दांव था।
यह बैठक भारत के लिए एक कूटनीतिक पहेली बन गई है, क्योंकि दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव और सहयोग का यह दौर भारत की विदेश नीति के लिए चुनौतियां और अवसर दोनों लेकर आया है। खासकर तब, जब ट्रंप ने बैठक से पहले भारत के रूस से तेल आयात को लेकर बयान दिया था, जिससे यह सवाल उठा कि क्या भारत को दबाव में लिया जा रहा है।
कोई समझौता नहीं, पर जारी रहेगी बातचीत
अलास्का में हुई इस बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन में चल रहे संघर्ष को समाप्त करने पर चर्चा की। हालांकि, बातचीत का कोई ठोस नतीजा या समझौता सामने नहीं आया।
ट्रंप का रुख: ट्रंप ने बातचीत को प्रगतिशील बताया, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि कोई समझौता तब तक नहीं होता, जब तक असल में समझौता नहीं हो जाता। उन्होंने दावा किया बातचीत में प्रगति हुई है लेकिन फिलहाल समझौते तक नहीं पहुंचा जा सका है। उन्होंने कहा, हम वहां तक नहीं पहुंचे।
पुतिन का रुख: पुतिन ने कहा कि रूस संघर्ष को खत्म करने में ईमानदारी से रुचि रखता है, लेकिन जोर दिया कि पहले मूल कारणों को खत्म करना होगा। उन्होंने अगली मुलाकात मॉस्को में होने का संकेत भी दिया। दोनों नेताओं ने संयुक्त बयान जारी किया, लेकिन पत्रकारों के सवालों का जवाब नहीं दिया। यह इस बात का संकेत है कि भले ही चर्चा हुई हो, लेकिन मतभेद अभी भी बरकरार हैं।
भारत के लिए संकेत
यह बैठक भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि बातचीत से पहले ट्रंप ने भारत के रूस से तेल आयात को लेकर बयान दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत के माध्यम से रूस को संदेश देने की एक कूटनीतिक रणनीति थी।
दबाव की राजनीति: ट्रंप ने रूस पर सेकेंडरी सेंक्शंस (द्वितीय प्रतिबंध) लगाने की धमकी दी और भारत का नाम लिया, जो रूस का एक बड़ा तेल ग्राहक है। राजन कुमार जैसे विशेषज्ञों के अनुसार, यह भारत पर दबाव बनाने की कोशिश थी ताकि रूस को एक सॉफ्ट टारगेट (आसान लक्ष्य) के जरिए संदेश दिया जा सके।
भारत की स्थिति: भारत ने इस दबाव के सामने झुकने का कोई संकेत नहीं दिया है। भारत सरकार का कहना है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वहीं से खरीद करेगी, जहां से उसे सबसे सस्ता तेल मिलेगा।
संभावित खतरा कम हुआ: प्रोफेसर राजन कुमार का आकलन है कि क्योंकि ट्रंप इस बैठक को अपनी तरफ से सफल मान रहे हैं, इसलिए भारत पर टैरिफ बढ़ाने या अतिरिक्त दबाव डालने की संभावना फिलहाल कम है। हालांकि, यदि भविष्य में वार्ता विफल होती है, तो यह स्थिति बदल सकती है।
प्रेस कांफ्रेंस में सवालों का अभाव
ट्रंप और पुतिन ने बयान देने के बाद किसी भी पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं दिया। यह एक असामान्य घटना थी और इसने कई सवाल खड़े किए।
ठोस समझौते की कमी: सवाल न लेने का मतलब यह हो सकता है कि कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है और वे अभी इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
मतभेदों की पुष्टि
बीबीसी रूस संपादक स्टीव रोजनबर्ग के अनुसार, यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यूक्रेन युद्ध पर दोनों नेताओं के बीच अभी भी गंभीर मतभेद हैं। ट्रंप रूस से युद्धविराम चाहते थे, लेकिन पुतिन ने यह नहीं दिया। कुल मिलाकर, ट्रंप-पुतिन बैठक एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना थी, लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। इसने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जटिलताओं को उजागर किया और दिखाया कि भू-राजनीतिक मुद्दों को सुलझाने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। भारत के लिए यह बैठक एक चेतावनी और एक अवसर दोनों है, क्योंकि यह उसे अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने की अहमियत याद दिलाती है।
इसको भी पढ़े: Trump की पुतिन को चेतावनी, युद्ध नहीं रोका तो भुगतने होंगे परिणाम
अमेरिका ने रूस से खरीदा था अलास्का
अमेरिका के अलास्का में ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति की मुलाकात हुई। इसका इतिहास भी बेहद दिलचस्प है। 19वीं सदी में अमेरिका ने रूस से अलास्का 7.2 मिलियन डॉलर (करीब 60 करोड़ रुपए) में खरीदा था। उस समय विशेषज्ञों ने अमेरिका को इस सौदे के लिए मूर्ख की संज्ञा दी थी, क्योंकि अलास्का को तब कोई खास तवज्जो नहीं दी गई। आज अलास्का अमेरिका का सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन 150 साल पहले यह रूस की संपत्ति हुआ करती थी। अलास्का में तेल, प्राकृतिक गैस और सोने के बड़े भंडार मिले। 1959 में अलास्का को अमेरिका का 49वां राज्य बनाया गया।
ट्रंप-पुतिन अलास्का में ही क्यों मिले
ट्रंप और पुतिन के अलास्का में मिलने की सबसे बड़ी वजह सुरक्षा है। अलास्का की मुख्य भूमि का सबसे नजदीकी हिस्सा रूस के चुकोटका से सिर्फ 90 किलोमीटर दूर है। पुतिन बिना किसी दुश्मन देश के ऊपर से उड़ान भर कर वहां पहुंचे थे। इस क्षेत्र में रूस के कुछ एयरफोर्स बेस और सैन्य निगरानी स्टेशन हैं, जहां परमाणु हथियार भी हो सकते हैं। पुतिन का यहां पर मिलना ज्यादा सुरक्षित ।



