सौर पर लगाएं जोर, ऊर्जा मिलेगी झकाझोर

जलवायु परिवर्तन के संकट से घिरी दुनिया में उम्मीद की रोशनी सूर्य से मिल रही है। सौर ऊर्जा का उत्पादन जितना तेज होगा, कार्बन उत्सर्जन में उतनी ही कमी आएगी।

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नई दिल्ली: भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक देश है। चीन और अमेरिका ही इस मामले में भारत से आगे हैं। यह उपलब्धि इसे 2023 में हासिल हुआ। जबकि एक दशक पहले, 2015 में इसका स्थान नौंवा था। इसकी बड़ी वजह केंद्र सरकार की सक्रिय दखल रही। बीते सालों में सरकार अक्षय ऊर्जा के इस स्रोत पर प्रमुखता से काम कर रही है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के शुद्ध रूप से शून्य उत्सर्जन परिदृश्य के अनुसार, 2030 तक सौर ऊर्जा वैश्विक बिजली उत्पादन का 22 फीसदी तक बढ़ जाएगी। भारत 2030 तक नवीकरणीय क्षमता को तीन गुना करने की योजना बनाने वाले कुछ देशों में से एक है। इस क्षमता को पूरा करने के लिए भारत को वार्षिक क्षमता वृद्धि उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने की आवश्यकता है।

ऊर्जा संकट की अचूक औषधि सौर ऊर्जा

सौर ऊर्जा धरती पर आने वाली सूर्य की रोशनी से मिलती है। इसी से पेड़-पौधों, जीव जंतुओं अपना खाना बनाते हैं। मौसमी बदलावों में भी यही ऊर्जा लगती है। इनमें सूर्य की ऊर्जा का सीधे इस्तेमाल होता है। यह प्राकृतिक है। किसी यंत्र की जरूरत नहीं। 1839 में इस दिशा में बड़ी पहल फ्रांस में हुई। फ्रांसीसी वैज्ञानिक एडमंड बेकरेल ने विद्युत-संचालन समाधान में रखे गए दो धातु इलेक्ट्रोडों से बने इलेक्ट्रोलाइटिक सेल के साथ इस्तेमाल करते हुए फोटोवोल्टिक प्रभाव की खोज की। बेकरेल को सौर ऊर्जा के जनक कहा गया।

बावजूद इस खोज के सौर ऊर्जा का चलन 20वीं सदी के आखिरी दशकों में हुआ। इसकी रीढ़ सौर पैनल बना, जिसे सौर सेलों के संयोजन से तैयार किया गया। सौर सेल ही सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने में मदद मिली। धूप में रखे जाने पर एक प्रोटोटाइप सौर सेल से 0.5-1.0 वोल्ट तक की वोल्टता विकसित होती है और 0.7 वाट बिजली पैदा होती है। बड़ी संख्या में सौर सेल को एक साथ जोड़ने से जो व्यवस्था बनती है, उसे सौर पैनल कहलाती है। इससे दैनिक उपयोग के लिए बिजली प्राप्त की जाती है।

सौर सेल का फायदा यह है कि इनमें कोई भी गतिमान पुरजा नहीं होता। इनका रखरखाव सस्ता है तथा यह बिना फोकसन युक्ति के अच्छे से काम करती है। यही नहीं, इन्हें उन सुदूर स्थानों में भी लगाया जा सकता है, जहां केबल बिछाना खर्चीला तथा व्यापारिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं रहता।

सौर सेल में सिलिकॉन बेहद अहम

सौर सेल बनाने के लिए सिलिकॉन का उपयोग होता है। यह प्रकृति में प्रचुर मात्रा में मौजूद है। लेकिन जिन विशिष्ट तरह के सिलिकॉन से सौर सेल बनती है, उसकी उपलब्धता सीमित है। सौर सेलों के उत्पादन की समस्त प्रक्रिया अभी भी बहुत महंगी है। इनको परस्पर संयोजित करके सौर पैनल बनाने में सिल्वर (चांदी) का उपयोग होता है, जिससे लागत बढ़ जाती है।

उच्च लागत तथा कम दक्षता होने पर भी सौर सेलों का उपयोग बहुत से वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकी अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है। मानव निर्मित उपग्रहों तथा अंतरिक्ष अन्वेषक युक्तियों जैसे मार्स ऑर्बिटर में सौर सेल ही ऊर्जा का प्रमुख है। रेडियो अथवा बेतार संचार तंत्रों अथवा सुदूर क्षेत्रों के टीवी रिले केंद्रों में सौर सेल पैनल उपयोग किए जाते हैं। ट्रैफिक सिग्नलों में भी इसे लगाया जाता है। सौर सेल पैनल इमारत की छतों पर लगाए जाते हैं। ताकि इन पर अधिक से अधिक सौर ऊर्जा डाली जा सके।

सोलर सिस्टम के तीन अहम हिस्से

सोलर सिस्टम का सबसे मुख्य भाग सोलर पैनल है। यह सूर्य से आने वाली किरणों को दिष्ट विद्युत धारा में बदल देता है। इसकी कीमत पूरे सोलर सिस्टम की 40 फीसदी तक बैठती है। इस समय दो तरह के सोलर पैनल उपलब्ध हैं; पुरानी तकनीक पर बना पॉली क्रिस्टलाइन (Polycrystalline) और आधुनिकतम मोनो क्रिस्टलाइन (Monocrystalline)।
सोलर सिस्टम का दूसरा अहम इनवर्टर है। यह सोलर पैनल से पैदा दिष्ट विद्युत धारा या डीसी करंट को प्रत्यावर्ती धारा या एसी करंट में बदलता है। इसकी कीमत पूरे सोलर सिस्टम का करीब 25 फीसदी होती है।
इसके बाद नंबर बैटरी का आता है। यह 24 घंटे तक बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित रखती है।

सौर स्थिरांक

पृथ्वी के वायुमंडल की परिरेखा पर सूर्य की किरणों के लंबवत स्थित खुले क्षेत्र के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर प्रति सेकंड पहुंचने वाली सौर ऊर्जा को सौर-स्थिरांक कहते हैं। जबकि इस क्षेत्र को सूर्य से पृथ्वी के बीच की औसत दूरी पर माना गया है। अनुमानतः इसका मान 1.4 kJ प्रति सेकंड प्रति वर्ग मीटर अथवा 1.4 kW/m2 है।

सौभाग्यशाली भारत, साल भर दिखता सूर्य

सौर ऊर्जा के मामले में भारत सौभाग्यशाली है। यहां सूर्य की रोशनी साल के ज्यादातर दिनों में मिलती रहती है। मात्रा भी पर्याप्त है। एक अनुमान के अनुसार, हमारा देश सूर्य से हर साल पांच हजार ट्रिलियन किलोवाट घंटा ऊर्जा पाता है। आसमान साफ रहने पर हर दिन चार से सात किलो वाट प्रति वर्ग मीटर के बीच सौर ऊर्जा मिलती है।

असल में, धरती पर सौर ऊर्जा ही एकमात्र ऐसा ऊर्जा स्रोत है, जिससे मिलने वाली ऊर्जा दूसरे स्रोतों से बहुत ज्यादा है। सूर्य करीब पांच करोड़ साल से बड़ी मात्रा में ऊर्जा दे रहा है। अगले करीब पांच करोड़ वर्ष तक यह ऊर्जा देता भी रहेगा। इसका छोटा सा अंश ही धरती के वायुमंडल की बाहरी सतह तक पहुंच पाता है। और धरातल तक तो इस अंश का भी आधा। फिर भी, हर साल सूर्य से पृथ्वी पर जितनी ऊर्जा पहुंचती है, उसकी मात्रा धरती पर पाए जाने वाले कोयले, तेल, गैस समेत सभी ऊर्जा स्रोतों की तुलना में 130 गुना ज्यादा है। अगर इसका यथाशक्ति दोहन किया जा सका तो धरती के ऊर्जा संकट का माकूल समाधान मिल सकता है।

सौर ऊर्जा की घटती कीमतें

भारत में सौर ऊर्जा की कीमतें प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ नीचे आती जा रही हैं। आलम यह है कि भारत में छतों पर लगायी जाने वाली सौर ऊर्जा परियोजना की लागत दुनिया के विकसित देशों से भी कम है। इसकी लागत देश में 66 डॉलर प्रति मेगावाट प्रति घंटा है जबकि चीन में यह 68 डॉलर प्रति मेगावाट प्रति घंटा है। अमेरिका तथा ब्रिटेन में यह आंकड़ा 238 डॉलर व 251 डॉलर है।

अहमदाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और विश्वविद्यालय के पर्यावरण तथा ऊर्जा के लिए वैश्विक केंद्र के निदेशक प्रियदर्शी शुक्ल, लंदन स्थित इम्पीरियल कॉलेज की शिविका मित्तल और कोलंबिया विश्वविद्यालय से जेम्स ग्लिन ने इससे जुड़ी एक रिपोर्ट तैयार की है। टीम का नेतृत्व आयरलैंड स्थित ऊर्जा, पर्यावरण और समुद्र के लिये प्रमुख शोध केंद्र एमएआरईआई के शोधकर्ता सिद्धार्थ जोशी ने किया।

मजेदार बात यह कि कम लागत के कारण घरों और वाणिज्यिक एवं औद्योगिक भवनों में इस्तेमाल किए जाने वाले छत पर लगे सौर पैनल जैसी आरटीएसपीवी तकनीक वर्तमान में सबसे तेजी से लगायी जाने वाली ऊर्जा उत्पादन तकनीक है। आरटीएसपीवी से 2050 तक वैश्विक बिजली की मांग का 49 प्रतिशत तक पूरा होने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक, अभी वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता में छतों पर लगायी जाने वाली सौर परियोजनाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है।

एसबी एनर्जी का निवेश, बढ़ी प्रतिस्पर्धा

2015 में जापान के सॉफ्ट बैंक ग्रुप ने एसबी एनर्जी (एसबीई) के जरिये भारत में सौर ऊर्जा परियोजनाओं में 20 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की थी। एसबीई भारती एंटरप्राइजेज और ताइवान की फॉक्सकॉन के बीच की संयुक्त उद्यम है। भारत के लिए यह घोषणा आदर्श दिखी। भारत में सूर्य की रोशनी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहती है और यह एक बड़ा बाजार भी है इसलिए यहां बड़ी सौर ऊर्जा परियोजनाएं लगाना हमेशा दूर से लाभकारी एवं आकर्षक दिखता है। लेकिन इसकी कीमत कोयले से प्राप्त बिजली से 50 प्रतिशत अधिक थी।

कीमत और उत्पादन

इस वक्त अलग-अलग सेक्टर में सौर ऊर्जा की प्रति यूनिट कीमत अलग-अलग है। सरकार की तरफ से नीलामी बेस्ड जो बड़ी सोलर परियोजनाएं लगाई जा रही हैं, वहां इसकी कीमत ₹2.2–₹2.8 के बीच है। जबकि रूफटॉप सोलर सिस्टम पर यह ₹3–₹6 है। वहीं, औद्योगिक व वाणिज्यिक सेक्टर में यह ₹3–₹5 है।

दूसरी तरफ बीते करीब दस साल में भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन तेजी से इजाफा हुआ है। Energy Istitute’s Statistical Review 2025 के मुताबिक, 2024-25 में 97.38 गीगावॉट सौर ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है। दुनिया में सौर ऊर्जा उत्पादन में तीसरे स्थान पर है। वहीं, कुल सौर क्षमता के मामले में राजस्थान शीर्ष पर है। गुजरात दूसरे स्थान पर है।

प्रधानमंत्री सूर्योदय योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2024 को इस योजना की घोषणा और फरवरी आखिर में इसे का लांच किया। योजना के तहत एक करोड़ घरों की छतों पर सौर रूफटॉप सिस्टम लगाने का लक्ष्य है। इसका मकसद गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को बिजली के बिलों से मुक्ति दिलाना और स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसका मकसद देश के ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है।

यह योजना सिर्फ मुफ्त में बिजली ही नहीं, बल्कि कमाई का भी मौका देगी। साथ ही रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस योजना के तहत 75,000 करोड़ रुपये का सरकार निवेश करेगी। 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त लेने के साथ अतिरिक्त बिजली ग्रिड में डालकर हर साल 15-17 हजार रुपये की कमाई भी की जा सकती है।

रुफ टॉप की मौजूदा क्षमता

दिसंबर 2023 तक छत पर लगाए गए सोलर प्रणाली की कुल क्षमता करीब 11.08 गीगावॉट है। सीईईडब्ल्यू की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुल रुफ टॉप सोलर प्रणाली की मात्र 20 फीसदी प्लांट आवासीय क्षेत्र में हैं। जबकि बाकी वाणिज्यिक और औद्योगिक क्षेत्रों में। देश के 25 करोड़ घर छतों पर कुल 637 गीगा वॉट की क्षमता की सौर प्रणाली स्थापित कर सकते हैं। इसकी कुल क्षमता का मात्र एक-तिहाई हिस्सा देश में संपूर्ण आवासीय क्षेत्रों की विद्युत की मांग को पूरा कर सकता है।

केंद्र सरकार के मुताबिक, दिसंबर 2024 तक भारत में रूफटॉप सोलर सिस्टम से 13.7 गीगा वॉट बिलजी पैदा होती थी। वहीं, जनवरी में यह बढ़कर 16 गीगावॉट हो गई। दूसरी तरफ वित्तीय वर्ष अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच रूफटॉप पीवी क्षमता में 5.15 गीगावॉट की बढ़ोत्तरी हुई है।

वैश्विक परिदृश्य

  • चीन: 887,930 MW
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: 177,470 MW
  • भारत: 97,384 MW
  • जापान: लगभग 91,610 MW

(Source: Energy Istitute’s Statistical Review 2025)

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