नई दिल्ली: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ अलास्का में हुई मुलाकात (Putin Trump Alaska Summit) में यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए एक बड़ा प्रस्ताव रखा। सूत्रों के हवाले से पता चला है कि पुतिन ने कहा कि अगर यूक्रेन अपनी सेना को पूर्वी डोनेट्स्क क्षेत्र से हटा ले, तो रूस युद्ध को विराम देने पर विचार कर सकता है। इसके साथ ही पुतिन ने यह भी शर्त रखी कि यूक्रेन को NATO में शामिल होने की कोशिशें पूरी तरह छोड़नी होंगी। इस मुलाकात के बाद ट्रम्प ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और यूरोपीय नेताओं को फोन पर पुतिन की मांगों से अवगत कराया। लेकिन जेलेंस्की ने साफ कर दिया कि वे किसी भी तरह की ‘जमीन की सौदेबाजी’ को स्वीकार नहीं करेंगे।
पुतिन की शर्तें: डोनेट्स्क के साथ NATO पर भी जोर
पुतिन का प्रस्ताव साफ है, अगर यूक्रेन डोनेट्स्क से अपनी सेना हटाता है, तो रूस दक्षिणी यूक्रेन के खेरसॉन और जापोरिज्जिया जैसे इलाकों में अपनी सैन्य कार्रवाइयां रोक देगा। इसका मतलब है कि रूस इन क्षेत्रों में नई जमीन कब्जाने की कोशिश नहीं करेगा। हालांकि, पुतिन ने अपनी पुरानी मांग को फिर दोहराया कि NATO को अब पूर्व की ओर विस्तार नहीं करना चाहिए। खास तौर पर, यूक्रेन को इस सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से रोकना रूस की प्राथमिकता है। पुतिन का कहना है कि अगर इन शर्तों पर सहमति बनती है, तो वे बाकी मुद्दों पर लचीलापन दिखाने को तैयार हैं। डोनेट्स्क का इलाका रूस के लिए रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद अहम है। यह क्षेत्र कोयला खदानों और भारी उद्योगों का गढ़ है, जो कभी यूक्रेन की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ हुआ करता था। रूस पहले से ही इस क्षेत्र के करीब 70% हिस्से पर कब्जा जमाए बैठा है, जबकि यूक्रेन के पास पश्चिमी हिस्से में कुछ अहम शहर, जैसे क्रामाटोरस्क और स्लोवियान्स्क, अभी भी हैं। अगर पुतिन की शर्तें मान ली गईं, तो रूस को पूरे डोनेट्स्क पर नियंत्रण मिल जाएगा, जिससे उसकी पूर्वी यूक्रेन में पकड़ और मजबूत हो जाएगी।
डोनेट्स्क का इतिहास: 2014 से चला आ रहा विवाद
डोनेट्स्क का मसला कोई नया नहीं है। 2014 में जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा किया, उसी दौरान डोनेट्स्क और लुहांस्क (सामूहिक रूप से डोनबास क्षेत्र) में रूस समर्थित अलगाववादियों ने बगावत शुरू कर दी। इन विद्रोहियों ने खुद को ‘डोनेट्स्क पीपुल्स रिपब्लिक’ (DPR) घोषित किया और रूस के समर्थन से इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में रूस को छोड़कर इसे मान्यता देने वाले देश बहुत कम हैं। 2022 में रूस की ओर से यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमले के बाद डोनेट्स्क युद्ध का मुख्य केंद्र बन गया। रूसी सेना ने धीरे-धीरे इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की और अब वह इसके 70% हिस्से पर नियंत्रण रखती है। यूक्रेन के लिए डोनेट्स्क न सिर्फ आर्थिक बल्कि रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र के खोने से यूक्रेन की पूर्वी सीमा कमजोर पड़ सकती है, जिससे रूस को और आक्रामक होने का मौका मिल सकता है। जेलेंस्की ने बार-बार कहा है कि वे अपनी जमीन का एक इंच भी नहीं छोड़ेंगे। उनकी यह बात यूक्रेन के संविधान से भी मेल खाती है, जो किसी भी क्षेत्र को छोड़ने की अनुमति नहीं देता।
जेलेंस्की की वाशिंगटन यात्रा: क्या बनेगी बात?
जेलेंस्की सोमवार को वाशिंगटन में ट्रम्प से मुलाकात करने वाले हैं, जहां पुतिन का यह प्रस्ताव चर्चा का केंद्र हो सकता है। यूक्रेन ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी हाल में डोनेट्स्क या किसी अन्य हिस्से को रूस के हवाले नहीं करेगा। जेलेंस्की का कहना है कि ऐसा करना न सिर्फ यूक्रेन की संप्रभुता के खिलाफ होगा, बल्कि यह रूस को भविष्य में और हमले करने का हौसला देगा। यूरोपीय नेता भी इस मसले पर यूक्रेन के साथ खड़े हैं। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने कहा है कि यूक्रेन की सीमाओं को बलपूर्वक नहीं बदला जा सकता।
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क्या होगा आगे?
पुतिन का यह प्रस्ताव एक तरफ जहां युद्ध को खत्म करने की उम्मीद जगाता है, वहीं दूसरी ओर यह यूक्रेन और उसके सहयोगियों के लिए एक मुश्किल सवाल खड़ा करता है। क्या यूक्रेन अपनी जमीन छोड़कर शांति खरीदेगा? या फिर वह NATO की सदस्यता की उम्मीद छोड़ देगा? इन सवालों का जवाब जेलेंस्की की ट्रम्प से मुलाकात में मिल सकता है। लेकिन इतना तय है कि डोनेट्स्क का मसला अभी लंबे समय तक गर्म रहेगा।



