नई दिल्ली: हिमालय की गोद में बसे नेपाल से एक ऐसी खबर आ रही है जिसने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में हलचल मचा दी है। नेपाल सरकार ऊपरी मुस्तांग में स्थित अरबों रुपये के यूरेनियम भंडार की प्रोसेसिंग का जिम्मा अमेरिका को सौंपने की गुप्त तैयारी कर रही है।
यह क्षेत्र चीन की सीमा से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे बीजिंग की चिंताएं बढ़ना तय माना जा रहा है। अमेरिकी विदेश राज्य मंत्री समीर पॉल कपूर का अचानक केवल नेपाल दौरा करना इन अटकलों को और हवा दे रहा है।
मुस्तांग स्पेशल जोन
रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल सरकार लो मान्थांग के 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ‘मुस्तांग स्पेशल जोन’ घोषित करने की योजना बना रही है। इस जोन को एक ‘उच्च-सुरक्षा अनुसंधान क्षेत्र’ के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां केवल नेपाली सेना और अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया की संयुक्त तकनीकी टीम को ही प्रवेश की अनुमति होगी।
समझौते से इनकार
हालांकि, पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और वित्त मंत्री रामेश्वर खनाल ने आधिकारिक तौर पर ऐसे किसी भी समझौते से इनकार किया है, लेकिन कुछ गोपनीय दस्तावेज संकेत देते हैं कि मार्च 2026 में एमसीसी प्रोजेक्ट की ऊर्जा को नए एआई डेटा केंद्रों से जोड़ने के बहाने इस पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है।
नेपाल के खान एवं भूगर्भ विभाग ने साल 2014 में मुस्तांग में यूरेनियम की एक बड़ी खान होने की पुष्टि की थी। यह भंडार लगभग 10 किमी लंबा और 3 किमी चौड़ा है, जिसमें ‘मीडियम ग्रेड’ का यूरेनियम होने का अनुमान है।
नेपाल के पास खनिज को निकालने लिए जरूरी तकनीक नहीं
नेपाल के पास वर्तमान में इस बेशकीमती खनिज को निकालने या प्रोसेस करने के लिए जरूरी तकनीक और बजट नहीं है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर अब ‘पैक्स सिलिका’ गठबंधन के तहत अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को यहां विशेष अधिकार दिए जाने की चर्चा है।
इस पूरे घटनाक्रम में 2017 का ‘एमसीसी प्रोजेक्ट’ केंद्र बिंदु बनकर उभरा है। चीन शुरू से ही इस अमेरिकी प्रोजेक्ट का विरोध करता रहा है, क्योंकि वह इसे नेपाल में अमेरिकी सैन्य और रणनीतिक प्रभाव के तौर पर देखता है।
अब ताजा खबरों के मुताबिक, इसी एमसीसी प्रोजेक्ट के जरिए मिलने वाली बिजली का उपयोग मुस्तांग में यूरेनियम प्रोसेसिंग के लिए किया जा सकता है। भारत और चीन दोनों ही इस क्षेत्र में अमेरिका जैसी तीसरी शक्ति की मौजूदगी को लेकर हमेशा संवेदनशील रहे हैं, ऐसे में नेपाल का यह कदम सीमावर्ती सुरक्षा और कूटनीति के नजरिए से बेहद विस्फोटक साबित हो सकता है।



