नई दिल्ली: दुनिया भर में मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां अब महामारी का रूप ले चुकी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ताजा ‘ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन न्यूरोलॉजी’ के मुताबिक, करीब 40 प्रतिशत वैश्विक आबादी, यानी 30 करोड़ से ज्यादा लोग – किसी न किसी न्यूरोलॉजिकल समस्या से ग्रस्त हैं। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि इन रोगों से हर साल 1.1 करोड़ से अधिक जानें जा रही हैं। रिपोर्ट ने सरकारों को कड़ा संदेश दिया है कि बिना तत्काल कदमों के यह संकट और गहरा जाएगा। WHO के अनुसार, दुनियाभर के महज एक-तिहाई देशों में ही इन बीमारियों से लड़ने के लिए कोई ठोस राष्ट्रीय रणनीति मौजूद है। ज्यादातर जगहों पर फंडिंग की किल्लत, कुशल डॉक्टरों की कमी और बुनियादी इलाज सुविधाओं का अभाव आम बात है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते निवेश न बढ़ा, तो आर्थिक और सामाजिक नुकसान अपूरणीय हो जाएगा।
टॉप 10 ब्रेन रोग: मौत और विकलांगता के सबसे बड़े दुश्मन
रिपोर्ट में 2021 के आंकड़ों के आधार पर उन प्रमुख न्यूरोलॉजिकल हालातों का जिक्र है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा तबाही मचा रहे हैं। ये हैं:
स्ट्रोक (पैरालिसिस): अचानक मस्तिष्क रक्त संचार बाधित होने से होने वाली यह समस्या मौतों की प्रमुख वजह।
नवजात एन्सेफैलोपैथी: जन्म के तुरंत बाद बच्चों के दिमाग को नुकसान, जो जीवनभर की जटिलताएं पैदा करता है।
माइग्रेन: असहनीय सिरदर्द जो करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी बर्बाद कर देता है।
अल्जाइमर और डिमेंशिया: बुजुर्गों में स्मृति ह्रास, जो परिवारों को भावनात्मक रूप से तोड़ देता है।
डायबिटीज से नसों का डैमेज (न्यूरोपैथी): शुगर कंट्रोल न होने पर हाथ-पैरों में झुनझुनी और कमजोरी।
मेनिन्जाइटिस: दिमाग की झिल्लियों में संक्रमण, जो जानलेवा साबित हो सकता है।
एपिलेप्सी (मिर्गी): अनियंत्रित दौरों से पीड़ित लाखों लोग बिना इलाज के भटक रहे।
जन्म से जुड़ी शॉर्ट-टर्म ब्रेन कॉम्प्लिकेशंस: नवजातों में तत्काल न्यूरोलॉजिकल दिक्कतें।
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर: बच्चों में व्यवहारिक और संज्ञानात्मक चुनौतियां।
नर्वस सिस्टम कैंसर: ट्यूमर जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करते हैं।
ये रोग न सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा बढ़ाते हैं, बल्कि उत्पादकता को भी चोट पहुंचाते हैं।
विकासशील देशों में हाहाकार: डॉक्टरों की भारी किल्लत
रिपोर्ट का सबसे दर्दनाक हिस्सा गरीब राष्ट्रों की कहानी है। कम आय वाले देशों में न्यूरोलॉजिस्ट्स की संख्या अमीर देशों से 80 फीसदी कम है, जिससे मरीजों को सही समय पर डायग्नोसिस और थेरेपी मिलना मुश्किल हो जाता है। ग्रामीण इलाकों में तो इलाज की कोई व्यवस्था ही नहीं न अस्पताल, न दवाएं, न रिहैब सेंटर। निम्न-मध्यम आय वाले मुल्कों में नेशनल प्लानिंग, बजट या ट्रेंड डॉक्टर्स का टोटा इतना गंभीर है कि करोड़ों लोग बिना मदद के सड़क पर हैं। केवल 25 फीसदी देश (करीब 49 राष्ट्र) ही इन बीमारियों को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (UHC) के दायरे में ला पाए हैं। इसका मतलब? स्ट्रोक वार्ड्स, चाइल्ड न्यूरो सर्विसेज या पेलिएटिव केयर जैसी जरूरी चीजें ज्यादातर लोगों के लिए सपना ही रह जाती हैं। WHO के असिस्टेंट डायरेक्टर-जनरल डॉ. जेरेमी फैरार ने कहा कि हर तीसरा इंसान ब्रेन हेल्थ की समस्या से जूझ रहा है। हमें यह गारंटी देनी होगी कि इलाज हर किसी की पहुंच में हो, चाहे गांव हो या शहर। कई रोगों को रोका जा सकता है, लेकिन सुविधाएं दूर हैं।
केयरगिवर्स पर बोझ: महिलाओं की अनदेखी पीड़ा
देखभाल का जिम्मा ज्यादातर परिवार की महिलाओं पर टूटता है, लेकिन सिर्फ 46 देशों में ही सपोर्ट सर्विसेज हैं और 44 में लीगल प्रोटेक्शन। इससे न सिर्फ जेंडर गैप बढ़ता है, बल्कि आर्थिक दबाव भी। रिपोर्ट चेताती है कि बिना सपोर्ट सिस्टम के, केयरगिवर्स खुद बीमार पड़ सकते हैं।
नीतिगत कमजोरी और डेटा का संकट
कमजोर हेल्थ इंफो सिस्टम और रिसर्च फंडिंग की कमी से पॉलिसी मेकिंग ठप हो जाती है। खासकर लो-इनकम कंट्रीज में डेटा गैप इतना बड़ा है कि रोगों का सही पैमाना समझना असंभव। WHO का 2022 का ‘इंटरसेक्टोरल ग्लोबल एक्शन प्लान ऑन एपिलेप्सी एंड अदर न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स’ इसी कमी को पूरा करने का प्रयास है। इसमें पॉलिसी को बूस्ट करना, सर्विसेज को एक्सेसिबल बनाना, लाइफस्टेज ब्रेन हेल्थ प्रमोट करना, डेटा स्ट्रॉन्ग करना और पेशेंट्स को इन्वॉल्व करना शामिल है।
आगे का रोडमैप: WHO की अपील
संगठन ने सभी देशों से गुजारिश की है:
- न्यूरो रोगों को नेशनल हेल्थ एजेंडे का कोर पार्ट बनाएं।
- UHC में ब्रेन केयर को जोड़ें।
- चाइल्डहुड से ओल्ड एज तक पब्लिक हेल्थ फोकस रखें।
- डेटा कलेक्शन और स्टडीज को पावरअप करें।



