तराई के पीले सपने: फिन बया क्यों हो रही है लुप्त?

2024 में नर फिन बया तो दिखे, मगर मादा का नामोनिशान न रहा। और 2025 आते-आते? न नर, न मादा बस खालीपन

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नई दिल्ली: कल्पना कीजिए, एक चटख पीला रंग लिए नन्हा बुनकर पक्षी, दलदली घासों के बीच फड़फड़ाता हुआ मादा का इंतजार कर रहा हो। लेकिन वो इंतजार अधूरा रह गया। उत्तराखंड के रुद्रपुर के हरिपुरा बांध के किनारे, जहां कभी ये दृश्य आम था, अब सन्नाटा पसर गया है। 2024 में नर फिन बया तो दिखे, मगर मादा का नामोनिशान न रहा। और 2025 आते-आते? न नर, न मादा बस खालीपन। ये छोटी-सी चिड़िया, जो स्थानीय बोलचाल में ‘पीली बया’ या ‘हिमालयी बुनकर’ कहलाती है, तराई के इन घास के मैदानों से धीरे-धीरे मिट रही है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल की सीमाओं पर बसे इन इलाकों में ये पक्षी बांधों, तालाबों और ऊंची घासों के बीच पनपती थी। सेमल और शीशम जैसे पेड़ों पर लटकते घोंसलों में ये अपना परिवार बसातीं। लेकिन अब ये कहानी खतरे की घंटी बजा रही है। क्या फिन बया का सफर यहीं थम जाएगा?

हरिपुरा का सन्नाटा: एक अध्ययन की चेतावनी

उधमसिंह नगर के हरिपुरा बांध और उसके आसपास का तराई इलाका लंबे समय से फिन बया का आखिरी किला था। लेकिन अब यहां भी उनकी उपस्थिति का कोई निशान नहीं। उत्तराखंड वन विभाग की रिसर्च विंग में काम करने वाली तनुजा ने 2021 से इस क्षेत्र का गहन सर्वे किया है। उनकी डायरी में दर्ज आंकड़े रोंगटे खड़े कर देते हैं। “शुरुआत में सब ठीक लग रहा था। मई से अगस्त तक प्रजनन सीजन में घोंसले बनते, पक्षी चहचहाते। 2021 में 17 नर और 10 मादा तक गिने। लेकिन हर साल संख्या घटती गई। 2024 में मादाएं गायब, और 2025 में कुछ नहीं। बौर बांध से जंगलों तक छान मारी, लेकिन न पक्षी, न घोंसला।” तनुजा की सबसे बड़ी उदासी ये कि पांच सालों में उन्होंने एक भी अंडा या नवजात चूजा नहीं देखा। बस कोशिशें, और असफलताएं।

उनके नोट्स में मौसम की मार भी साफ झलकती है। 2021 का सूखा – जून तक बूंद न टपकी, दलदल सूखे मैदान बन गए। फिन बया को तो पानी और कीचड़ की जरूरत। वहीं 2023 में बाढ़ ने सब बहा दिया। पक्षी बार-बार घोंसले छोड़ रही थीं, जैसे जगह ही पसंद न आ रही हो या डर सताने लगा हो। ये सब बांध के पानी प्रबंधन से जुड़ा है, सिंचाई के नाम पर स्तर बदलते रहते हैं। स्थानीय बर्डवॉचर राजेश पंवार, जो ई-बर्ड प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं, कहते हैं, तराई के घास के मैदान अब खेत बन गए। बांध में पानी कम हो तो गेहूं की फसल, और पेड़? काटकर जला दिए जाते हैं। सितारगंज, किच्छा, बाजपुर इन जगहों से तो फिन बया सालों पहले ही गायब हो चुकी। नैनीताल-हरिद्वार के वेटलैंड्स में भी अब सन्नाटा।

पुरानी रिपोर्टों की सच्चाई: 84% की भयानक गिरावट

ये हालात 2017 की ‘स्टेटस ऑफ फिन वीवर इन इंडिया’ रिपोर्ट को सत्यापित कर रहे हैं। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के पूर्व सहायक निदेशक डॉ. रजत भार्गव ने 1990 से 2017 तक देशव्यापी सर्वे कर ये रिपोर्ट तैयार की। नतीजा? तराई में खेती का फैलाव, घास की कटाई, शहरों का विस्तार, फैक्टरियां सबने आवास चाक-चौबंद कर दिया। उधमसिंह नगर में 2012-17 के बीच 84-96% आबादी गायब। पूरे उत्तराखंड-यूपी में सिर्फ 200 बचीं। डॉ. भार्गव चेताते हैं, विलुप्ति का समय आ गया है। सरकार की मर्जी न हुई तो ये चिड़िया हमेशा के लिए खो जाएगी। जब प्रजाति मुट्ठी भर बची हो, तभी एक्शन लो – देर हो जाएगी। फिन बया की एक सब-स्पीशीज (प्लोसीयस मेगाहरिंकस सलीमाली) असम के काजीरंगा-मानस में बची है, कभी प. बंगाल में भी 300 के आसपास थीं। कुल मिलाकर देश में 500। BNHS के पूर्व चेयरमैन असद रहमानी कहते हैं, नब्बे के दशक में नेपाल के शुक्लाफांटा में भी रिकॉर्ड था। शायद तराई से पलायन किया, लेकिन वहां भी संख्या नहीं बढ़ रही। सरकार बाघ-हाथी पर फोकस, फिन बया जैसी छोटी प्रजाति पर क्यों नजर न पड़ी? हमने 2017 में कंजर्वेशन ब्रीडिंग का प्रपोजल दिया – बजट भी कम लगता। लेकिन उत्तराखंड-यूपी को मिलकर हैबिटेट बचाना होगा।” 2016 में बर्डलाइफ इंटरनेशनल ने इसे ‘वुल्नरेबल’ कहा, 2021 में ‘एंडेंजर्ड’।

कौव्वों का साया: एक और खतरा

वन विभाग की तलाश बेकार क्यों? अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. विवेक पांडे बताते हैं, प्रयास जारी हैं, लेकिन बरसात के प्रजनन सीजन में ही गहरे पीले रंग से पहचान होती है। तराई सेंट्रल डिवीजन लोकल कम्युनिटी और वॉचर्स के साथ मॉनिटरिंग कर रहा। सफल प्रजनन का कोई सबूत नहीं, न पलायन का। शायद घोंसले छिपे हैं। लेकिन इतिहास गवाह है। 1866 में एओ ह्यूम ने पहली बार खोजी, फ्रैंक फिन के नाम पर नाम पड़ा। डॉ. सलीम अली ने अभियान चलाए। डॉ. भार्गव के सर्वे में कौव्वे उभरे कम आबादी में कॉलोनी पर हमला, 8-10 अंडे-चूजे लापता। दो दिन बाद कॉलोनी सूनी। BNHS के पूर्व डायरेक्टर डॉ. दीपक आप्टे कहते हैं, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या वल्चर मॉडल अपनाओ। हैबिटेट प्रोटेक्ट, कौव्वों से घोंसला गार्ड। कैप्टिव ब्रीडिंग से संख्या बढ़ाओ। घास मैदान वाली प्रजाति, तो लोकल कम्युनिटी इन्वॉल्व। राजनीतिक विल चाहिए। IUCN के एलेक्स बेरीमैन ने अगस्त 2025 में हरिपुरा जाकर चेक किया: न दिखीं। लोकल एक्सटिंक्शन का संकेत। 2021 के बाद री-असेसमेंट की जरूरत। नेपाल समेत मॉनिटरिंग से डेटा लो अगर क्रिटिकली एंडेंजर्ड हुईं, तो स्टेटस अपग्रेड।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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