नई दिल्ली: सपनों की नदियां अब कचरे की नालियां बनती जा रही हैं। शहरों में बिछे आधे-अधूरे सीवर नेटवर्क की वजह से लाखों लीटर अनट्रिटेड गंदा पानी सीधे बह रहा है। नदियों में, नालों में, और आखिरकार समुद्र तक। बरसाती नाले, जो सिर्फ बारिश का पानी निकालने के लिए बने हैं, अब सीवेज का बोझ उठा रहे हैं। लेकिन क्या ये सिलसिला रुकेगा? राष्ट्रीय मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) ने 22 नवंबर 2025 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को सौंपी रिपोर्ट में साफ कहा, ये हालात असहनीय हैं। झारखंड के धनबाद में कत्री, वासुदेव नदियों और जोरिया नाले के प्रदूषण पर फोकस करते हुए रिपोर्ट चेताती है कि बिना देरी के इंटरसेप्शन एंड डायवर्जन (I&D) जैसी तकनीक अपनानी होगी, वरना नदियां जहर की धारा बन जाएंगी।
नदियों को नाला बताकर 800 करोड़ की ‘ट्रिक’? NGT ने उठाए सवाल
NGT ने 4 नवंबर को धनबाद के शहरी इलाके का जायजा लिया और हैरान रह गया। कत्री और वासुदेव जैसी नदियों को आधिकारिक कागजों में ‘ड्रेन’ या नाला ही लिखा गया है! इसी बहाने 808 करोड़ की ‘टैपिंग’ स्कीम लॉन्च करने की तैयारी। ट्रिब्यूनल ने NMCG से पूछा, क्या बरसाती नालों को सीधे STP (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) से जोड़ा जा सकता है? और क्या बिना साफ किए गंदा पानी नालों में छोड़ना जायज है, जब ये NGT, सुप्रीम कोर्ट के फरमानों और 1974 के वाटर पॉल्यूशन कंट्रोल एक्ट के खिलाफ है? NMCG की रिपोर्ट में साफ स्टैंड है कि नदियों का सही मैनेजमेंट लॉन्ग-टर्म प्लान के साथ इंटरिम सॉल्यूशंस पर निर्भर। रिसर्च और नेशनल गाइडलाइंस भी I&D को हरी झंडी दिखाते हैं। ये तकनीक गंदे पानी को पकड़कर STP की ओर मोड़ती है, ताकि नदियां सांस ले सकें। रिपोर्ट कहती है, जब नदियों में 9-10 महीने लो फ्लो रहता है, तब ये तरीका प्रदूषण को 70-80% तक काट सकता है। STP को डिजाइन करते वक्त ‘पॉल्यूशन लोड’ का हिसाब रखा जाता है, तो थोड़ा एक्स्ट्रा वॉल्यूम भी हैंडल हो जाता है, बिना क्वालिटी से समझौता।
अधूरे सीवर: शहरों की सबसे बड़ी सिरदर्दी
भारत के शहरों में सीवेज सिस्टम की हालत दयनीय है। गंगा बेसिन के कई इलाकों में तो सीवर लाइनें ही गायब। लाखों घरों का गंदा पानी बिना फिल्टर के नदियों में समा रहा। NMCG ने कबूल किया, ये सिस्टम अपर्याप्त है, और तुरंत I&D जैसे स्टेप्स उठाने पड़ेंगे। लेकिन ये परमानेंट सॉल्यूशन नहीं। राज्य सरकारें और म्यूनिसिपल बॉडीज को पूरा नेटवर्क बिछाने में 5-7 साल लग सकते हैं। तब तक I&D से गंदे पानी को ‘डायवर्ट’ करना मजबूरी। रिपोर्ट में CSE (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट) की मार्च 2025 वाली ‘डाउन टू अर्थ’ रिपोर्ट का जिक्र है। CSE कहती है, नालों को टैप करना, कचरा स्क्रीनिंग और डायवर्जन से प्रदूषण आधा हो जाता है। MoHUA, CPCB, नीति आयोग और वर्ल्ड बैंक भी सहमत। नामामी गंगे प्रोग्राम (जो 1985 के गंगा एक्शन प्लान का अपग्रेडेड वर्जन है) इसी दिशा में काम कर रहा। घनी आबादी वाले शहरों जैसे कानपुर, वाराणसी या धनबाद में जगह की तंगी है।
झारखंड का केस: नदियां vs नाले का झगड़ा
झारखंड अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कंपनी (JUIC) ने कन्फर्म किया। वासुदेव और कत्री असली नदियां हैं, जोरिया नाला। ऊपरी इलाकों से आता गंदा पानी इन्हें जहर बना रहा। NMCG का फेज्ड प्लान: पहले I&D से तुरंत रोकथाम, फिर फुल सीवेज नेटवर्क। ये डबल अप्रोच प्रदूषण को जड़ से उखाड़ फेंकेगी। लेकिन रिपोर्ट चेताती है कि बरसाती नालों को परमानेंट STP से लिंक न करें, ये सिर्फ ब्रिज सॉल्यूशन है। अमृत और स्वच्छ भारत मिशन के तहत सेंट्रल फंडिंग जारी है, लेकिन ग्राउंड पर एक्शन की कमी। NMCG का मैसेज क्लियर है कि प्रदूषण कंट्रोल का सबसे फास्ट वे I&D है, लेकिन बंद नेटवर्क का काम रुकेगा नहीं।
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क्या बदलेगा ये सब? नदियों को बचाने की जंग
ये रिपोर्ट सिर्फ धनबाद तक सीमित नहीं है, पूरे देश की नदियों के लिए वेक-अप कॉल है। क्या सरकारें सुनेंगी? क्या शहरवासी दबाव बनाएंगे? अनट्रिटेड सीवेज से न सिर्फ पानी दूषित हो रहा, बल्कि हेल्थ क्राइसिस भी खड़ी हो रही डायरिया से कैंसर तक। NMCG ने सुझाया है कि लोकल बॉडीज को सख्ती से टास्क दें, STP कैपेसिटी बढ़ाएं। अगर I&D को सही से लागू किया गया, तो गंगा जैसी पवित्र नदियां फिर से साफ हो सकती हैं। लेकिन वक्त कम है। आपकी नदी भी खतरे में है, आवाज उठाइए, वरना कल ये जहर आपकी थाली तक पहुंच जाएगा। क्या कहते हो, तैयार हो बदलाव लाने के लिए?



