नई दिल्ली: हर साल 14 अगस्त को विश्व छिपकली दिवस (World Lizard Day) के रूप में मनाया जाता है, जो हमें इन छोटे लेकिन महत्वपूर्ण जीवों की दुनिया से रूबरू कराता है। ये सरीसृप न सिर्फ अपनी अनोखी विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं, बल्कि वे प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। दुनिया भर में इनकी करीब 7,000 से ज्यादा प्रजातियां मौजूद हैं, और भारत जैसे विविधता वाले देश में ये विभिन्न जलवायु और इलाकों में पनपती हैं। उदाहरण के तौर पर, अगामा परिवार की छिपकलियां और नील नदी मॉनिटर लिजर्ड जैसी प्रजातियां न केवल देखने में आकर्षक हैं, बल्कि वे कीड़ों की संख्या को काबू में रखने, मृत जीवों को साफ करने और पर्यावरण की सेहत बताने वाले संकेतक के रूप में काम करती हैं।
मानव गतिविधियों से बढ़ता संकट
दुर्भाग्य से, तेजी से फैलते शहर, बदलती जलवायु और लोगों की गलत धारणाओं के कारण ये जीव गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। उनके रहने की जगहें लगातार सिकुड़ रही हैं, और मौसम के बदलाव उनके जीवन चक्र को बिगाड़ रहे हैं। भारत में अगामा छिपकलियों की कई किस्में पाई जाती हैं, जो देश के अलग-अलग इलाकों के मुताबिक ढली हुई हैं। मिसाल के लिए, हिमालयी चट्टानी अगामा (पैरालाउडकिया हिमालयाना) ऊंचे पहाड़ों में रहती है, जबकि प्रायद्वीपीय चट्टानी अगामा (समोफिलस डोर्सालिस) सूखे इलाकों में। फैन-थ्रोटेड लिजर्ड (सिटाना पोंटिसेरियाना) अपनी गर्दन फैलाने की क्षमता से मशहूर है, और ओरिएंटल गार्डन लिजर्ड (कैलोट्स वर्सीकलर) हमारे बगीचों में आम दिखाई देती है। हर प्रजाति की अपनी खासियत है, जो पारिस्थितिकी को मजबूत बनाती है।
रंग बदलने की अद्भुत क्षमता
अगामा छिपकलियों में शारीरिक और व्यवहारिक बदलावों का कमाल देखने को मिलता है। इनमें सबसे मजेदार बात है उनकी रंग बदलने की काबिलियत, जो खतरे से बचाने या साथी को आकर्षित करने में मदद करती है। लेकिन इनकी उपयोगिता के बावजूद, खतरे कम नहीं हैं। शहरों का फैलाव, जंगलों की कटाई और खेती का विस्तार उनके घरों को तबाह कर रहा है। कई प्रजातियां जैसे प्रायद्वीपीय पर्वतीय अगामा, खास चट्टानी या रेगिस्तानी जगहों पर निर्भर हैं, जो इंसानी दखल से टुकड़ों में बंट रही हैं। इससे उनकी आनुवंशिक विविधता घट रही है, और वे बदलते माहौल के प्रति ज्यादा कमजोर हो रही हैं।
जलवायु बदलाव से बढ़ती मुश्किलें
जलवायु परिवर्तन इन समस्याओं को और गहरा रहा है। बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और खाने की कमी उनके प्रजनन, भोजन और आराम के पैटर्न को प्रभावित कर रही है। नतीजतन, इनकी संख्या घटने का जोखिम बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा, लोगों की नकारात्मक सोच भी एक बड़ी बाधा है। छिपकलियां अक्सर डर या बीमारी से जोड़ी जाती हैं, जिससे लोग उन्हें घरों या बागों से भगाने की कोशिश करते हैं।
नील नदी मॉनिटर की खास भूमिका
नील नदी मॉनिटर लिजर्ड जैसी प्रजातियां शिकारी और सफाईकर्ता दोनों हैं। वे अंडे, मृत जानवर खाकर आक्रामक जीवों को नियंत्रित करती हैं और बीमारियों को फैलने से रोकती हैं। कई नदियों में ये पर्यावरण की सेहत का पैमाना हैं – उनकी कमी प्रदूषण या ज्यादा मछली पकड़ने की निशानी हो सकती है।
इतिहास और संस्कृति में विशेष स्थान
छिपकलियां सिर्फ जीव नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा भी रही हैं। प्राचीन ग्रीक में इन्हें देखना शुभ माना जाता था, जबकि दक्षिण अफ्रीका की कहानियों में ये पूर्वजों से संदेश लाती हैं। कई संस्कृतियों में इनकी पूंछ छोड़ने की क्षमता को नई शुरुआत का प्रतीक देखा जाता है। एज़्टेक सभ्यता में इनके त्वचा के पैटर्न ने डिजाइन प्रेरित किए, और कंबोडिया के अंगकोर वाट में इन्हें पुनर्जन्म के रूप में उकेरा गया है।
विज्ञान और चिकित्सा में योगदान
पारंपरिक इलाज में भी इनका इस्तेमाल होता है। भारत के कुछ इलाकों में सूखी छिपकली का पाउडर अस्थमा के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जबकि अफ्रीका में त्वचा की बीमारियों के लिए। विज्ञान में गेको लिजर्ड के चिपकने वाले पैरों ने नए गोंद विकसित करने में मदद की, जो चिकित्सा और स्पेस तकनीक में काम आते हैं। कुछ छिपकलियां स्पेस मिशनों में गईं, जहां रूसी वैज्ञानिकों ने भारहीनता के प्रभावों का अध्ययन किया।
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जरूरी बातें
- दुनिया में 7,000+ छिपकली प्रजातियां।
- भारत की प्रमुख: हिमालयी रॉक अगामा, फैन-थ्रोटेड लिजर्ड, ओरिएंटल गार्डन लिजर्ड।
- भूमिका: कीट नियंत्रण, सफाई, पर्यावरण संकेतक।
- खतरे: जगहों का नुकसान, मौसम बदलाव, मानवीय पूर्वाग्रह।
- विज्ञान: चिपकने वाले पदार्थ, स्पेस रिसर्च।
- संस्कृति: शुभ प्रतीक, मंदिर नक्काशी, पारंपरिक दवाएं।



