नई दिल्ली: घूमना जीवन का ज़रूरी अनुभव हैं, घुमक्कड़ साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं.. “कमर बांध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है”। दरअसल भारत में यायावर, यात्रियों का अपना एक इतिहास रहा है। हजारों सालों के इतिहास में हजारों यायावर, घुमक्कड़, यात्रियों का तांता भारत में लगा रहा। मध्यकाल में कुछ यात्री जब यही रच बस गए तो एक मिश्रित संस्कृति पनपी, जिसे गंगा जमुनी तहजीब कहा जाने लगा। भारतीय संस्कृति के इन्ही सब गुणों के लिए जयशंकर प्रसाद लिखते हैं..
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा
आज इस लेख में हम मध्यकाल के उन खानाबदोश यात्रियों की बात करने करेंगे, जिन्होंने भारत को अपने-अपने चश्मे से देखा। इसमें कुछ यात्री ऐसे भी है, जिन्होंने भारत की प्रशंसा में खूब कसीदें पढ़ी। जबकि कुछ यात्री ऐसे भी हुए जो भारत से घृणा करने लगे; जैसे हाजिन नामक यात्री। सबसे पहले बात करते हैं, उन यात्रियों की जिन्होंने भारत और भारतीय भाषा-साहित्य की तारीफ की और अपने लेखों में भारत जिक्र एक शानदार देश के तौर पर किया।
अलबरूनी
एक यात्री अलबरूनी जो उज्वेकिस्तान से महमूद गजनी के साथ भारत आया। इसने भारत में अपने यात्रा अनुभव पर एक किताब लिखी जिसका नाम है “किताब- उल-हिन्द”। वह एक लेखक, विद्वान, विचारक, खगोलशास्त्री, भाषाविद्, वैज्ञानिक, ज्योतिषी था। उसने भारतीय संस्कृत भाषा की तारीफ करते हुए कहा है “यदि आप संस्कृत भाषा सीखना चाहते हैं तो ये आसान नहीं होगा क्योंकि अरबी भाषा की तरह ही, शब्दों तथा विभक्तियों, दोनों में ही इस भाषा की पहुँच बहुत ज्यादा है”।
इब्नबतूता
13 जून 1325 को मोरक्को का यात्री अबू अब्दुल्ला मुहम्मद इब्न बतूता एक ऐतिहासिक और असाधारण यात्रा पर अपने घर से निकला। अगले तीन दशकों के दौरान इसने उत्तरी अफ़्रीका से लेकर चीन तक हैरतअंगेज़ यात्राएं कीं। इसी दौरान भारत की यात्रा भी की। मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में काज़ी भी रहा और बाद में तुगलक की ओर से राजदूत के तौर पर चीन की यात्रा की। इन्होने भारत की कई चीजों का वर्णन किया जैसे- एक फल नारियल के बारे में लिखता है- “ये वृक्ष सबसे विस्मयकारी वृक्षों में से एक है, हु-ब-हु खजूर के जैसे.. नारियल का फल इंसानी सर से मेल खाता है, इसमें मानो दो आंखें और एक मुंह है; अन्दर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है”। इसी तरह इब्नबतूता पान के पत्ते को भी आश्चर्य से देखता है और मजेदार तरीके से भारतीय लोगों के पान खाने की कहानी कहता है।

अब्दुरज्जाक
एक और विवरण की बात करें तो 15 वी सदी का एक अन्य यात्री अब्दुरज्जाक अपने यात्रा वृत्तान्त में भारत को एक विचित्र देश मानता है। केरल कालीकट के बारे में वह लिखता है “यहां ऐसे लोग बसे हुए हैं जिनकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी”। लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि यही यात्री मंगलोर के एक मंदिर की और उसकी वास्तु रचना की खूब तारीफ करता है। अब्दुरज्जाक लिखता है – “मंगलौर से नौ मील भीतर मैंने एक ऐसा पूजा स्थल देखा, जो पूरे विश्व में अतुलनीय है, यह वर्गाकार था प्रवेश द्वार में आदम कद की सोने की एक मूर्ती थी, इसकी दोनों आंखों में काले रंग के माणिक इतनी चतुराई से लगाये गए थे कि प्रतीत होता था मानो वह देख सकती हो; इस शिल्प और कारीगरी के क्या कहने”।
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हालांकि इतिहास पढ़ते समय यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कभी-कभी इन यात्रियों की बातें अतिरंजित और अधूरे तथ्यों से भरी होती थी। जैसे अलबरूनी एक जगह कहता है “भारत में हिमालय के पास ऐसी विशाल चींटियां पाई जाती हैं, जो मिट्टी से सोना निकालती हैं”। इस तरह की बिना लॉजिक इनकी सभी बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता, लेकिन कहीं न कहीं आज जो हम अपना इतिहास जानते हैं, उसमे इन यात्रियों का बहुत योगदान है। इसलिए इन यात्रिओं के बारे में जानना हमारे लिए महत्वपूर्ण है।
सोर्स- एनसीईआरटी भारत सरकार



